भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 5. विरह विलाप । षटताल जियरा क्यों रहै रे, तुम्हारे दर्शन बिन बेहाल ॥ टेक ॥ परदा अंतर कर रहे, हम जीवैं किहिं आधार। सदा संगाती प्रीतमा, अब के लेहु उबार ॥ 1 ॥ गोप्य गुसांइ ह्रै रहे, अब काहे न प्रकट होइ। राम सनेही संगिया, दूजा नांही कोइ ॥ 2 ॥ अन्तरयामी छिप रहे, हम क्यों जीवैं दूर। तुम बिन व्याकुल केशवा, नैन रहे जल पूर ॥ 3 ॥ आप अपरछन ह्रै रहे, हम क्यों रैनि बिहाइ। दादू दर्शन कारणै, तलफ तलफ जीव जाइ ॥ 4 ॥ 6. विरह हैरान । त्रिताल अजहूँ न निकसैं प्राण कठोर। दर्शन बिना बहुत दिन बीते, सुन्दर प्रीतम मोर ॥ टेक ॥ चार पहर चारों युग बीते, रैनि गँवाई भोर। अवधि गई अजहूँ नहिं आये, कतहूँ रहे चित-चोर ॥ 1 ॥ कबहूँ नैन निरख नहिं देखे, मारग चितवत तोर। दादू ऐसे आतुर विरहनी, जैसे चंद चकोर ॥ 2 ॥ 7. सुन्दरी श्रृंगार सो-धन पीवजी साज सँवारी, अब वेगि मिलो तन जाइ बनवारी ॥ टेक ॥ साज श्रृंगार किया मन मांही, अजहूँ पीव पतीजै नांही ॥ 1 ॥ पीव मिलन को अहिनिशि जागी, अजहूँ मेरी पलक न लागी ॥ 2 ॥ जतन-जतन कर पंथ निहारूँ, पीव भावै त्यों आप सँवारूं ॥ 3 ॥ अब सुख दीजे जाऊँ बलिहारी, कहै दादू सुन विपति हमारी ॥ 4 ॥

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