सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 जे जन सेवक बहुत बिगारे, तो साहिब गरवा दोष निवारे ॥ ३ ॥ समर्थ साँई साहिब मेरा, दादू दास दीन है तेरा ॥ ४ ॥ 16. करुणा । वीर विक्रम ताल क्यों कर मिलै मोकौं राम गुसाँई, यहु बिषिया मेरे वश नांही ॥ टेक ॥ यहु मन मेरा दहदिशि धावै, नियरे राम न देखन पावे ॥ 1 ॥ जिह्वा स्वाद सबै रस लागे, इन्द्री भोग विषय को जागे ॥ 2 ॥ श्रवणहुँ साच कदे नहिं भावे, नैन रूप तहँ देख लुभावे ॥ 3 ॥ काम क्रोध कदे नहीं छीजे, लालच लाग विषय रस पीजे ॥ 4 ॥ दादू देख मिले क्यों साँई, विषय विकार बसे मन मांही ॥ 5 ॥ 17. परिचय विनती । वीर विक्रम ताल जो रे भाई ! राम दया नहीं करते । नवका नाम खेवट हरि आपै, यों बिन क्यों निस्तरते ॥ टेक ॥ करणी कठिन होत नहिं मोपै, क्यों कर ये दिन भरते । लालच लाग परत पावक में, आपहि आपै जरते ॥ 1 ॥ स्वाद हि संग विषय नहिं छूटै, मन निश्चल नहिं धरते । खाय हलाहल सुख के तांई, आपै ही पच मरते ॥ 2 ॥ मैं कामी कपटी क्रोध काया में, कूप परत नहिं डरते । करवत काम शीश धर अपने, आपहि आप विहरते ॥ 3 ॥ हरि अपना अंग आप नहिं छाड़ै, अपनी आप विचरते । पिता क्यों पूत को मारै, दादू यूं जन तिरते ॥ 4 ॥ 18. विरह विलाप विनती । द्वितीय ताल तो लग जनि मारे तूँ मोहि, जो लग मैं देखूं नहिं तोहि ॥ टेक ॥ अब के बिछुरे मिलन कैसे होइ, इहि विधि बहुरि न चिन्है कोइ ॥ 1 ॥
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