भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गौड़ी 1 55. प्रश्न । गजताल कौण शब्द कौण परखणहार, कौण सुरति कहु कौण विचार ॥ टेक ॥ कौण सुज्ञाता कौण गियान, कौण उन्मनी कौण धियान ॥ 1 ॥ कौण सहज कहु कौण समाध, कौण भक्ति कहु कौण आराध ॥ 2 ॥ कौण जाप कहु कौण अभ्यास, कौण प्रेम कहु कौण पियास ॥ 3 ॥ सेवा कौण कहो गुरुदेव, दादू पूछे अलख अभेव ॥ 4 ॥ उत्तर की साखी कौण शब्द ? दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नख शिख सकल शरीर । सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 1 ॥ कौण परखणहार ? प्राण जौहरी पारिखू, मन खोटा ले आवै । खोटा मन के माथे मारै, दादू दूर उड़ावै ॥ 2 ॥ कौण सुरति ? दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग । अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहिबा संग ॥ 3 ॥ कौण विचार ? सहज विचार सुख में रहै, दादू बड़ा विवेक। मन इन्द्री पसरै नहीं, अंतर राखै एक ॥ 4 ॥ कौण सुज्ञाता ? दादू सो ही पंडित ज्ञाता, राम मिलण की बूझै ॥ 5 ॥ कौण गियान ? हंस गियानी सो भला, अंतर राखै एक। विष में अमृत काढ ले, दादू बड़ा विवेक ॥ 6 ॥ कौण उन्मनी ? मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढ़ै आकाश । पग रहि पूरे सांच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 7 ॥ कौण धियान ? जहँ विरहा तहँ और क्या, सुधि बुधि नाठे ज्ञान । लोक वेद मारग तजे, दादू एकै ध्यान ॥ 8 ॥ कौण सहज ? सहज रूप मन का भया, जब द्वै द्वै मिटी तरंग । ताता सीला सम भया, तब दादू एकै अंग ॥ 9 ॥ कौण समाधि ? सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि । लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥

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