सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग माली गौड़ 2 ४1. करुणा । झपताल गोविन्द ! कैसे तरिये । नाव नांही खेव नाहीं, राम विमुख मरिये ॥ टेक ॥ ज्ञान नांही ध्यान नांही, लै समाधि नांही । विरहा वैराग नांही, पंचों गुण मांही ॥ 1 ॥ प्रेम नांही प्रीति नांही, नांव नांही तेरा । भाव नांही भक्ति नांही, कायर जीव मेरा ॥ 2 ॥ घाट नांही बाट नांही, कैसे पग धरिये । वार नांही पार नांही, दादू बहु डरिये ॥ 3 ॥ ४2. विरह । शंखताल पीव ! आव हमारे रे, मिलि प्राण पियारे रे, बलि जाऊँ तुम्हारे रे ॥ टेक ॥ सुन सखी सयानी रे, मैं सेव न जानी रे, हौं भई दिवानी रे ॥ 1 ॥ सुन सखी सहेली रे, क्यों रहूँ अकेली रे, हौं खरी दुहेली रे ॥ 2 ॥ हौं करूँ पुकारा रे, सुन सिरजनहारा रे, दादू दास तुम्हारा रे ॥ 3 ॥ ४3. शंख ताल वाल्हा सेज हमारी रे, तूँ आव हौं वारी रे, हौं दासी तुम्हारी रे ॥ टेक ॥ तेरा पंथ निहारूं रे, सुन्दर सेज सँवारूं रे, जियरा तुम्ह पर वारूं रे ॥ 1 ॥ तेरा अंगड़ा पेखूं रे, तेरा मुखड़ा देखूं रे, तब जीवन लेखूं रे ॥ 2 ॥ मिल सुखड़ा दीजे रे, यहु लाहड़ा लीजे रे, तुम देखें जीजे रे ॥ 3 ॥ तेरे प्रेम की माती रे, तेरे रंगड़े राती रे, दादू वारणै जाती रे ॥ 4 ॥ ४4. फारसी । शूलताल दरबार तुम्हारे दरदवंद, पीव पीव पुकारे । दीदार दरूने दीजिये, सुन खसम हमारे ॥ टेक ॥ तनहाँ के तन पीर है, सुन तूँ ही निवारे ।
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