भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 दादू पंच स्वादी पंच दिशि, पंचे पंचों बाट। तब लग कह्या न कीजिये, गहि गुरु दिखाया घाट ॥ 100 ॥ दादू पंचों एक मत, पंचों पूज्या साथ। पंचों मिल सन्मुख भये, तब पंचों गुरु की बाट ॥ 101 ॥ सतगुरु विमुख ज्ञान दादू ताता लोहा तिणैं सौं, क्यूं कर पकड़या जाइ। गहन गति सूझै नहीं, गुरु नहीं बूझै आइ ॥ 102 ॥ गुरुमुख कसौटी दादू औगुण गुण कर माने गुरु के, सोई शिष्य सुजाण। सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥ 103 ॥ सोने सेती बैर क्या, मारे घण के घाइ। दादू काटि कलंक सब, राखै कंठ लगाइ ॥ 104 ॥ पाणी माहैं राखिये, कनक कलंक न जाहि। दादू गुरु के ज्ञान सौं, ताइ अगनि में बाहि ॥ 105 ॥ दादू माहैं मीठा हेत करि, ऊपर कड़वा राख। सतगुरु सिष कौं सीख दे, सब साधों की साख ॥ 106 ॥ दादू कहै, सिष भरोसे आपणै, ह्वै बोली हुसियार। कहेगा सो बहेगा, हम पहली करैं पुकार ॥ 107 ॥ दादू सतगुरु कहै सो कीजिये, जे तूं सिष सुजाण। जहाँ लाया तहँ लागि रहु, बुझे कहा अजाण ॥ 108 ॥ गुरु पहली मन सौं कहै, पीछे नैन की सैन। दादू सिष समझै नहीं, कहि समझावै बैन ॥ 109 ॥ कहै लखै सो मानवी, सैन लखै सो साध। मन लखै सो देवता, दादू अगम अगाध ॥ 110 ॥

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