भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-गुरुदेव का अंग 1 कठोरता दादू कहि कहि मेरी जीभ रही, सुनि सुनि तेरे कान । सतगुरु बपुरा क्या करै, जो चेला मूढ़ अजान ॥ 111 ॥ गुरु शिष्य प्रबोध एक शब्द सब कुछ कह्या, सतगुरु सिष समझाइ । जहाँ लाया तहँ लागै नहीं, फिर फिर बूझै आइ ॥ 112 ॥ अज्ञ स्वभाव अपलट ज्ञान लिया सब सीख सुणि, मन का मैल न जाइ । गुरु बिचारा क्या करै, सिष विषै हलाहल खाइ ॥ 113 ॥ सतगुरु की समझै नहीं, आपणै उपजै नांहि । तो दादू क्या कीजिए, बुरी बिथा मन मांहि ॥ 114 ॥ सत्यासत्य गुरु पारख गरु अपंग पग पंष बिन, शिष शाखा का भार । दादू खेवट नाव बिन, क्यूं उतरेंगे पार ॥ 115 ॥ दादू शंसा जीव का, शिष शाखा का साल । दोनों को भारी पड़ी, होगा कौण हवाल ॥ 116 ॥ झूठे गुरु और झूठे शिष्यों की गति अंधे अंधा मिल चले, दादू बंध कतार । कूप पड़े हम देखतां, अंधे अंधा लार ॥ 117 ॥ सोधी नहीं शरीर की, औरों को उपदेश । दादू अचरज देखिया, ये जाहिंगे किस देस ॥ 118 ॥ दादू सोधी नहीं शरीर की, कहैं अगम की बात । जान कहावैं बापुड़े, आवध लिए हाथ ॥ 119 ॥ सत्यासत्य गुरु पारख लक्षण दादू माया माहै काढि करि, फिर माया में दीन्ह । दोऊ जन समझैं नहीं, एको काज न कीन्ह ॥ 120 ॥

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