भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 356

श्री दादूवाणी-राग केदार 6 दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥ 2 ॥ 129. (गुजराती) । पंचम ताल तूँ छे मारो राम गुसांई, पालवे तारे बाँधी रे । तुज बिना हूँ आंतरे र-वल्यो, कीधी कमाई लाधी रे ॥ टेक ॥ जीवूं जेटला हरि बिना रे, देहड़ी दुःखे दाधी रे । अेणे अवतारे कांई न जाण्यूं, माथे टक्कर खाधी रे ॥ 1 ॥ छूटको मारो क्यारे थाशे, शक्यों न राम अराधी रे । दादू ऊपर दया मया कर, हूँ तारो अपराधी रे ॥ 2 ॥ 130. (गुजराती) विनती । पंचमताल तूँ ही तूँ तनि माहरे गुसांई, तूँ बिना तूँ केने कहूँ रे । तूँ त्यां तूँ ही थई रह्यो रे, शरण तुम्हारी जाय रहूँ रे ॥ टेक ॥ तन मन मांहि जोइये त्यां तूँ, तुज दीठां हौं सुख लहूँ रे । तूँ त्यां जेटली दूर रहूँ रे, तेम तेम त्यां हौं दुःख सहूँ रे ॥ 1 ॥ तुम बिन माहरो कोई नहीं रे, हौं तो ताहरा वैण बहूँ रे । दादू रे जण हरि गुण गाता, मैं मेलूँ माहरो मैं हूँ रे ॥ 2 ॥ 131. केवल विनती । त्रिताल हमारे तुम ही हो रखपाल । तुम बिन और नहीं को मेरे, भव-दुख मेटणहार ॥ टेक ॥ वैरी पंच निमष नहिं न्यारे, रोक रहे जम काल । हा जगदीश ! दास दुख पावै, स्वामी करहु सँभाल ॥ 1 ॥ तुम्ह बिन राम दहैं ये द्वन्दर, दसौं दिशा सब साल । देखत दीन दुखी क्यों कीजे, तुम हो दीन-दयाल ॥ 2 ॥ निर्भय नाम हेत हरि दीजे, दर्शन पर्सन लाल ।

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