सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरम थान सुख निधान, परम शून्य खेलै । सहज भाइ सुख समाइ, जीव ब्रह्म मेलै ॥ 2 ॥ अगम निगम होइ सुगम, दुस्तर तिर आवै । आदि पुरुष दरस परस, दादू सो पावै ॥ 3 ॥ 163. साधु साँई हेरे त्रिताल कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥ टेक ॥ कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे, कोई आप उबारे रे ॥ 1 ॥ कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवंता रे ॥ 2 ॥ कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे ॥ 3 ॥ कोई पार को पाया रे, कोई मिलकरआया रे, कोई मन को भाया रे ॥ 4 ॥ कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे ॥ 5 ॥ कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे, कोई अमृत खाता रे ॥ 6 ॥ कोई नूर पिछाणैं रे, कोई तेज कों जाणैं रे, कोई ज्योति बखाणैं रे ॥ 7 ॥ कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे ॥ 8 ॥ 164. साधु लक्षण । दीपचन्दी सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार । भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥ टेक ॥ पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार । सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥ 1 ॥ जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार । जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥ 2 ॥ सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार । दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥ 3 ॥