भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग रामकली 8 जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥ 2 ॥ मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िबा। दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणें मारग चढ़िबा ॥ 3 ॥ 187. हितोपदेश । शूलताल सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, ते मेरे प्राण अधारी। निराकार निरंजन देवा रे, लेवा तेह विचारी ॥ टेक ॥ अपरम्पार परम निज सोई, अलख तोर विस्तारं। अंकुर बीजे सहज समाना रे, ऐसा समर्थ सारं ॥ 1 ॥ जे तैं किन्हा किन्हि इक चीन्हा रे, भइला ते परिमाणं। अविगत तोरी विगति न जाणूं, मैं मूरख अयानं ॥ 2 ॥ सहजें तोरा ए मन मोरा, साधन सौं रंग आई। दादू तोरी गति नहिं जानैं, निर्बाहो कर लाई ॥ 3 ॥ 188. मन प्रति सूरतन । त्रिताल हरि मारग मस्तक दीजिये, तब निकट परम पद लीजिये ॥ टेक ॥ इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाँव न धरणा। अब आगे होई सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥ 1 ॥ ज्यों शूरा रण झूझै, तब आपा पर नहिं बूझै। सिर साहिब काज संवारै, घण घावां आपा डारै ॥ 2 ॥ सती सत गहि साचा बोलै, मन निश्चल कदे न डोलै। वाके सोच पोच जिय ना आवै, जग देखत आप जलावै ॥ 3 ॥ इस सिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे। ताका सब सिर साबित होवे, जब दादू आपा खोवे ॥ 4 ॥ 189. कलियुगी । त्रिताल

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