सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग रामकली 8 बिन ही काया मिलै परस्पर, ज्यों जल जलहि समाई ॥ 2 ॥ बिन ही ठाहर आसण पूरे, बिन कर बैन बजावै । बिन ही पावों नाचै निशिदिन, बिन जिभ्या गुण गावै ॥ 3 ॥ सब गुण रहिता सकल बियापी, बिन इंद्री रस भोगी । दादू ऐसा गुरु हमारा, आप निरंजन जोगी ॥ 4 ॥ २11. रूपक ताल इहै परम गरु योगं, अमी महारस भोगं ॥ टेक॥ मन पवना स्थिर साधं, अविगत नाथ अराधं, तहँ शब्द अनाहद नादं ॥ १ ॥ पंच सखी परमोधं, अगम ज्ञान गुरु बोधं, तहँ नाथ निरंजन शोधं ॥ २ ॥ सद्गुरु मांहि बतावा, निराधार घर छावा, तहँ ज्योति स्वरूपी पावा ॥ ३ ॥ सहजैं सदा प्रकाशं, पूरण ब्रह्म विलासं, तहँ सेवक दादू दासं ॥ ४ ॥ २12. (गुजराती) अनभई । त्रिताल मूने येह अचंभो थाये । कीड़ीये हस्ती विडान्यो, तेन्नें बैठी खाये ॥ टेक ॥ जाण हु तो ते बैठो हारे, अजाण तेन्नें ता वाहे । पांगुलोउ जाबा लाग्यो, तेन्नें कर को साहे ॥ १ ॥ नान्हो हुतो ते मोटो थायो, गगन मण्डल नहिं माये । मोटे रो विस्तार भणीजे, ते तो केन्नें जाये ॥ २ ॥ ते जाणे जे निरखी जोवे, खोजी नें वलीमांहे । दादू तेन्नों मर्म न जाणें, जे जिह्वा विहूणों गाये ॥ ३ ॥ इति राग रामकली सम्पूर्ण ॥ 8 ॥ पद 46 ॥
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