सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 आप समागम सेवका, साधू यूं भाखै ॥ 1 ॥ आप करै प्रतिपालना, दारुण दुख टारै। इच्छा जन की पूरवै, सब कारज सारै ॥ 2 ॥ कर्म कोटि भय भंजना, सुख मंडन सोई। मन मनोरथ पूरणा, ऐसा और न कोई ॥ 3 ॥ ऐसा और न देखिहौं, सब पूरण कामा। दादू साधु संगी किये, उन आतम रामा ॥ 4 ॥ 324. (गुजराती) मन स्थिरार्थ विनती । त्रिताल तुम बिन राम कवन कलि मांही, विषिया थैं कोइ वारे रे। मुनियर मोटा मनवैं बाह्या, येन्हा कौन मनोरथ मारे रे ॥ टेक ॥ छिन एकैं मनवो मर्कट माहरो, घर घरबार नचावे रे। छिन एकैं मनवो चंचल माहरो, छिन एकैं घरमां आवे रे ॥ 1 ॥ छिन एकैं मनवो मीन अम्हारो, सचराचर मां धाये रे। छिन एकैं मनवो उदमद मातो, स्वादैं लागो खाये रे ॥ 2 ॥ छिन एकैं मनवो ज्योति पतंगा, भ्रम भ्रम स्वादैं दाझे रे। छिन एकैं मनवो लोभैं लागो, आपा पर में बाझे रे ॥ 3 ॥ छिन एकैं मनवो कुंजर माहरो, वन वन मांहिं भ्रमाड़े रे। छिन एकैं मनवो कामी माहरो, विषिया रंग रमाड़े रे ॥ 4 ॥ छिन एकैं मनवो मिरग अम्हारो, नादैं मोह्यो जाये रे। छिन एकैं मनवो माया रातो, छिन एकैं हमनें बाहे रे ॥ 5 ॥ छिन एकैं मनवो भँवर अम्हारो, बासैं कंवल बँधाणें रे। छिन एकैं मनवो चहुँ दिशि जाये, मनवा नें कोई आणें रे ॥ 6 ॥ तुम बिन राखै कौन विधाता, मुनिवर साखी आणें रे। दादू मृतक छिन में जीवे, मनवा चरित न जाणें रे ॥ 7 ॥
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