भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 325. बेखर्च व्यसनी । ब्रह्म ताल करणी पोच, सोच सुख करई, लौह की नाव कैसे भौजल तिरई ॥ टेक ॥ दक्षिण जात पश्चिम कैसे आवै, नैन बिन भूल बाट कित पावै ॥ 1 ॥ विष वन बेलि, अमृत फल चाहै, खाइ हलाहल, अमर उमाहै ॥ 2 ॥ अग्नि गृह पैसि कर सुख क्यों सोवै, जलन लागी घणी, सीत क्यों होवै ॥ 3 ॥ पाप पाखंड कीये, पुण्य क्यों पाइये, कूप खन पड़िबा, गगन क्यों जाइये ॥ 4 ॥ कहै दादू मोहि अचरज भारी, हिरदै कपट क्यों मिलै मुरारी ॥ 5 ॥ 326. परिचय प्राप्ति । खेमटा ताल मेरा मन के मन सौं मन लागा, शब्द के शब्द सौं नाद बागा ॥ टेक ॥ श्रवण के श्रवण सुन सुख पाया, नैन के नैन सौं निरख राया ॥ 1 ॥ प्राण के प्राण सौं खेल प्राणी, मुख के मुख सौं बोल वाणी ॥ 2 ॥ जीव के जीव सौं रंग राता, चित्त के चित्त सौं प्रेम माता ॥ 3 ॥ शीश के शीश सौं शीश मेरा, देखि रे दादू वा भाग तेरा ॥ 4 ॥ 327. मन को उपदेश । त्रिताल मल्हार में मेरे शिखर चढ़ बोल मन मोरा, राम जल वर्षे शब्द सुण तोरा ॥ टेक ॥ आरत आतुर पीव पुकारै, सोवत जागत पंथ निहारै ॥ 1 ॥ निशवासर कह अमृत वाणी, राम नाम ल्यौ लाइ ले प्राणी ॥ 2 ॥ टेर मन भाई, जब लग जीवे, प्रीति कर गाढ़ी प्रेम रस पीवे ॥ 3 ॥ दादू अवसर जे जन जागे, राम घटा-जल वरषण लागे ॥ 4 ॥ 328. वैराग्य उपदेश त्रिताल नारी नेह न कीजिये, जे तुझ राम पियारा, माया मोह न बंधिये, तजिये संसारा ॥ टेक ॥ विषिया रंग राचै नहीं, नहीं करै पसारा।

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