भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 445

श्री दादूवाणी-राग गुंड(गौंड) 20 देह गेह परिवार में, सब तैं रहै नियारा ॥ 1 ॥ आपा पर उरझै नहीं, नाहीं मैं मेरा। मनसा वाचा कर्मना, सांई सब तेरा ॥ 2 ॥ मन इन्द्रिय स्थिर करे, कतहूं नहिं डोले। जग विकार सब परिहरे, मिथ्या नहिं बोले ॥ 3 ॥ रहे निरंतर राम सौं, अंतरगति राता। गावे गुण गोविन्द का, दादू रस माता ॥ 4 ॥ 329. आज्ञाकारी । झपताल तूं राखै त्यों ही रहैं, तेई जन तेरा। तुम्ह बिन और न जानहीं, सो सेवक नेरा ॥ टेक ॥ अम्बर आपै ही धन्या, अजहूँ उपकारी। धरती धारी आप तैं, सबही सुखकारी ॥ 1 ॥ पवन पास सब के चलै, जैसे तुम कीन्हा। पानी परकट देखिहूँ, सब सौं रहै भीना ॥ 2 ॥ चंद चिराकी चहुँ दिशा, सब शीतल जानै। सूरज भी सेवा करै, जैसे भल मानै ॥ 3 ॥ ये निज सेवक तेरड़े, सब आज्ञाकारी। मोको ऐसे कीजिये, दादू बलिहारी ॥ 4 ॥ 330. निन्दक । झपताल निदंक बाबा बीर हमारा, बिनही कौड़े बहै बिचारा ॥ टेक ॥ कर्म कोटि के कश्मल काटे, काज सँवारै बिन ही साटे ॥ 1 ॥ आपण डूबै और को तारे, ऐसा प्रीतम पार उतारे ॥ 2 ॥ जुग जुग जीवो निन्दक मोरा, राम देव तुम करो निहोरा ॥ 3 ॥ निदंक बपुरा पर उपकारी, दादू निंदा करै हमारी ॥ 4 ॥

  • 445 -