सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 ऐसे निकस जाइ या तन तैं, जैसे जीव न जानै रे ॥ 1 ॥ कोटिक जतन करत या मन को, निश्चल निमष न होई रे । चंचल चपल चहुँ दिशि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥ 2 ॥ सदा सोच रहत घट भीतर, मन थिर कैसे कीजे रे । सहजैं सहज साधु की संगति, दादू हरि भजि लीजे रे ॥ 3 ॥ ३४०. माया । उत्सव ताल इन कामिनी घर घाले रे । प्रीति लगाइ प्राण सब सोषै, बिन पावक जिय जाले रे ॥ टेक ॥ अंग लगाइ सार सब लेवै, इनतैं कोई न बाचै रे । यहु संसार जीत सब लीया, मिलन न देई साचै रे ॥ 1 ॥ हेत लगाइ सबै धन लेवै, बाकी कछु न राखै रे । माखन मांहि सोध सब लेवै, छाछ छिया कर नाखै रे ॥ 2 ॥ जे जन जानि जुगति सौं त्यागैं, तिन को निज पद परसै रे । काल न खाइ, मरै नहिं कबहुँ, दादू तिनको दरशै रे ॥ 3 ॥ ३४१. विश्वास । उत्सव ताल जनि सत छाड़ै बावरे, पूरक है पूरा । सिरजे की सब चिन्त है, देबे को सूरा ॥ टेक ॥ गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा । युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥ 1 ॥ कुंज कहाँ धर संचरै, तहाँ को रखवारा । हिमहर तैं जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥ 2 ॥ जल थल जीव जिते रहैं, सो सब को पूरै । संपट सिला में देत है, काहे नर झूरै ॥ 3 ॥ जिन यहु भार उठाइया, निर्वाहै सोई ।
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