भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 दादू कहै सीख सुन मेरी, कहु करीम संभाल सबेरी ॥ 4 ॥ 337. भंगताल बार बार तन नहीं वावरे, काहे को बाद गँवावै रे । बिनसत बार कछू नहिं लागै, बहुरि कहाँ को पावै रे ॥ टेक ॥ तेरे भाग बड़े भाव धर कीन्हाँ, क्यों कर चित्र बनावै रे । सो तूँ लेइ विषय में डारे, कंचन छार मिलावै रे ॥ 1 ॥ तूँ मत जानै बहुरि पाइये, अब कै जनि डहिकावै रे । तीनि लोक की पूँजी तेरे, बनिज बेगि सो आवै रे ॥ 2 ॥ जब लग घट मैं श्वास वास है, तब लग काहे न ध्यावै रे । दादू तन धर नाम न लीन्हा, सो प्राणी पछतावै रे ॥ 3 ॥ 338. ललित ताल राम विसार्यो रे जगनाथ । हीरा हार्यो देखत ही रे, कौड़ी कीन्ही हाथ ॥ टेक ॥ काचहुता कंचन कर जानै, भूल्यो रे भ्रम पास । साचे सौं पल परिचय नाहीं, कर काचे की आस ॥ 1 ॥ विष ताको अमृत कर जानै, सो संग न आवै साथ । सेमल के फूलन पर फूल्यो, चूक्यो अब की घात ॥ 2 ॥ हरि भज रे मन सहज पिछानै, ये सुन साची बात । दादू रे अब तैं कर लीजै, आयु घटै दिन जात ॥ 3 ॥ 339. मन । ललित ताल मन चंचल मेरो कह्यो न मानै, दसों दिशा दौरावै रे । आवत जात बार नहि लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥ टेक ॥ बेर बेर बरजत या मन को, किंचित सीख न मानै रे ।

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