भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग बिलावल 21

३३४. (फारसी) विनती । उदीक्षण ताल मालिक महरबान करीम । गुनहगार हररोज हरदम, पन्ह राख रहीम ॥ टेक ॥ अव्वल आखिर बंदा गुनही, अमल बद विसियार । गरक दुनिया सत्तार साहिब, दरदवंद पुकार ॥ 1 ॥ फरामोश नेकी बदी करद, बुराई बद फैल । बख्शिन्दः तूँ अजीब आखिर, हुक्म हाजिर सैल ॥ 2 ॥ नाम नेक रहीम राजिक, पाक परवरदिगार । गुनह फिल कर देहु दादू, तलब दर दीदार ॥ 3 ॥ ३३५. उदीक्षण ताल कौण आदमी कमीण विचारा, किसको पूजे गरीब पियारा ॥ टेक ॥ मैं जन एक, अनेक पसारा, भौजल भरिया अधिक अपारा ॥ 1 ॥ एक होइ तो कहि समझाऊँ, अनेक अरूझे क्यों सुरझाऊँ ॥ 2 ॥ मैं हौं निबल, सबल ये सारे, क्यों कर पूजूं बहुत पसारे ॥ 3 ॥ पीव पुकारूं समझत नाहीं, दादू देखु दशों दिशि जाहीं ॥ 4 ॥ ३३६. उपदेश चेतावनी । भंगताल जागहु जियरा काहे सोवे, सेव करीमा तो सुख होवै ॥ टेक ॥ जातैं जीवन सो तैं विसारा, पच्छिम जाना पथ न संवारा । मैं मेरी कर बहुत भुलाना, अजहुँ न चेतै दूर पयाना ॥ 1 ॥ सांई केरी सेवा नाँहीं, फिर फिर डूबै दरिया मांहीं । ओर न आवा, पार न पावा, झूठा जीवन बहुत भुलावा ॥ 2 ॥ मूल न राख्या लाह न लीया, कौड़ी बदले हीरा दीया । फिर पछताना संबल नाहीं, हार चल्या क्यों पावै सांई ॥ 3 ॥ इब सुख कारण फिर दुख पावै, अजहुँ न चेतै क्यों दहकावै ।

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