सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग बिलावल 21 तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा । यूं तप कर-कर देह जलावैं, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥ सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई । तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ 4 ॥ 347. साधु परीक्षा । दादरा सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै । राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक॥ मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं । औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद माहीं ॥ 1 ॥ निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै । सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ 2 ॥ आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा । सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ 3 ॥ निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई । दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ 4 ॥ 348. परिचय परीक्षा । पतिताल राम मिल्या यूँ जानिये, जाको काल न व्यापै । जरा मरण ताको नहीं, अरु मेटै आपै ॥ टेक ॥ सुख दुख कबहूँ न ऊपजै, अरु सब जग सूझै । क रम को बाँधै नहीं, सब आगम बूझै ॥ 1 ॥ जागत है सो जन रहै, अरु जुग जुग जागै । अंतरजामी सौं रहै, कछु काई न लागै ॥ 2 ॥ काम दहै सहजैं रहै, अरु शून्य विचारै । दादू सो सब की लहै, अरु कबहूं न हारै ॥ 3 ॥
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