भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 462

श्री दादूवाणी-कायाबेली ग्रंथ 23 काया माँही खुले कपाट, काया माँही निरंजन हाट। काया माँही है दीदार, काया माँही देखणहार ॥ 3 ॥ काया माँही राम रंग राते, काया माँही प्रेम रस माते। काया माँही अविचल भये, काया माँही निहचल रहे ॥ 4 ॥ काया माँही जीवै जीव, काया माँही पाया पीव। काया माँही सदा आनंद, काया माँही परमानन्द ॥ 5 ॥ काया माँही कुशल है, सो हम देख्या आइ। दादू गुरुमुख पाइये, साधु कहैं समझाइ ॥ 6 ॥ 363. राज विद्याधर ताल काया माँही देख्या नूर, काया माँही रह्या भरपूर। काया माँही पाया तेज, काया माँही सुन्दर सेज ॥ 1 ॥ काया माँही पुंज प्रकाश, काया माँही सदा उजास। काया माँही झिलमिल सारा, काया माँही सब तैं न्यारा ॥ 2 ॥ काया माँही ज्योति अनन्त, काया माँही सदा बसन्त। काया माँही खेलें फाग, काया माँही सब वन बाग ॥ 3 ॥ काया माँही खेलें रास, काया माँही विविध विलास। काया माँही बाजैं बाजे, काया माँही नाद धुनि साजे ॥ 4 ॥ काया माँही सेज सुहाग, काया माँही मोटे भाग। काया माँही मंगलाचार, काया माँही जै जैकार ॥ 5 ॥ काया अगम अगाध है, माँही तूर बजाइ। दादू प्रकट पीव मिल्या, गुरुमुख रहे समाइ ॥ 6 ॥ इति कायाबेली ग्रन्थ सम्पूर्णः ॥ 23 ॥ पद 10 ॥

  • 462 -
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक) · पृष्ठ 462, कुल 504 में से · BharatKosha