सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-राग भैरूं 25 जामण मरण जाइ, भव भाजै, अवरण के घर वरण समाइ । दादू जाय मिलै जगजीवन, तब यहु आवागमन विलाइ ॥ 4 ॥ 405. एक ताल जीवन मूरी मेरे आतम राम, भाग बड़े पायो निज ठाम ॥ टेक ॥ शब्द अनाहद उपजै जहाँ, सुषमन रंग लगावै तहाँ । तहँ रंग लागे निर्मल होइ, ये तत उपजे जानै सोइ ॥ 1 ॥ सरवर तहाँ हंसा रहे, कर स्नान सबै सुख लहै । सुखदाई को नैनहुँ जोइ, त्यों त्यों मन अति आनन्द होइ ॥ 2 ॥ सो हंसा शरणागति जाइ, सुन्दरि तहाँ पखाले पाइ । पीवै अमृत नीझर नीर, बैठे तहाँ जगत गुरु पीर ॥ 3 ॥ तहँ भाव प्रेम की पूजा होइ, जा पर किरपा जानै सोइ । कृपा करि हरि देइ उमंग, तहँ जन पायो निर्भय संग ॥ 4 ॥ तब हंसा मन आनंद होइ, वस्तु अगोचर लखै रे सोइ । जा को हरि लखावै आप, ताहि न लिपैं पुन्य न पाप ॥ 5 ॥ तहँ अनहद बाजै अद्भुत खेल, दीपक जलै बाती बिन तेल । अखंड ज्योति तहँ भयो प्रकास, फाग बसंत ज्यों बारह मास ॥ 6 ॥ त्रय स्थान निरंतर निरधार, तहँ प्रभु बैठे समर्थ सार । नैनहुँ निरखूं तो सुख होइ, ताहि पुरुष को लखै न कोइ ॥ 7 ॥ ऐसा है हरि दीनदयाल, सेवक की जानें प्रतिपाल । चलु हंसा तहँ चरण समान, तहँ दादू पहुँचे परिवान ॥ 8 ॥ 406. आत्म परमात्म रास । एकताल घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥ गंगा जमना अंतर-वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ 1 ॥ कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ 2 ॥
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