भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग भैरूं 25


दुविधा दुर्मति दूरि गँवाई, राम रमत सांची मन आई ॥ २ ॥ नीच ऊँच मध्यम को नांही, देखूं राम सबन के मांही ॥ ३ ॥ दादू सांच सबन में सोई, पैंड पकर जन निर्भय होई ॥ ४ ॥

५०२. हित उपदेश। खेमटा ताल हाजिरां हजूर सांई, है हरि नेड़ा दूर नांही ॥ टेक ॥ मनी मेट महल में पावै, काहे खोजन दूरि जावै ॥ १ ॥ हिर्स न होइ, गुस्सा सब खाइ, तातैं संइयां दूर न जाइ ॥ २ ॥ दुई दूर दरोग न होइ, मालिक मन में देखै सोइ ॥ ३ ॥ अरि ये पाँच शोध सब मारै, तब दादू देखै निकटि विचारै ॥ ४ ॥

५०३. खेमटा ताल राम रमत है देखे न कोइ, जो देखे सो पावन होइ ॥ टेक ॥ बाहिर भीतर नेड़ा न दूर, स्वामी सकल रह्या भरपूर ॥ १ ॥ जहां देखूं तहँ दूसर नांहि, सब घट राम समाना मांहि ॥ २ ॥ जहाँ जाऊँ तहँ सोई साथ, पूर रह्या हरि त्रिभुवन नाथ ॥ ३ ॥ दादू हरि देखे सुख होहि, निशदिन निरखन दीजे मोहि ॥ ४ ॥

५०४. अध्यात्म। एकताल मन पवन ले उनमन रहै, अगम निगम मूल सो लहै ॥ टेक ॥ पाँच वायु जे सहज समावै, शशिहर के घर आणै सूर। शीतल सदा मिलै सुखदाई, अनहद शब्द बजावै तूर ॥ १ ॥ बंकनालि सदा रस पीवै, तब यहु मनवा कहीं न जाइ। विकसै कमल प्रेम जब उपजै, ब्रह्म जीव की करै सहाइ ॥ २ ॥ बैस गुफा में ज्योति विचारै, तब तेहिं सूझै त्रिभुवन राइ। अंतर आप मिलै अविनाशी, पद आनन्द काल नहिं खाइ ॥ ३ ॥

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