भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 राम बिना छूटै नहीं, कीजै बहुत उपाइ । कोटि किया सुलझै नहीं, अधिक अलूझत जाइ ॥ ३ ॥ दीन दुखी तुम देखताँ, भौ दुख भंजन राम । दादू कहै कर हाथ दे हो, तुम सब पूरण काम ॥ ४ ॥ 425. करुणा विनती । त्रिताल जनि छाड़ै राम जनि छाड़ै, हमहिं विसार जनि छाड़ै । जीव जात न लागै बार, जनि छाड़ै ॥ टेक ॥ माता क्यों बालक तजै, सुत अपराधी होइ । कबहुँ न छाड़े जीव तैं, जनि दुःख पावै सोइ ॥ १ ॥ ठाकुर दीनदयाल है, सेवक सदा अचेत । गुण औगुण हरि ना गिणै, अंतर तासौं हेत ॥ २ ॥ अपराधी सुत सेवका, तुम हो दीन दयाल । हमतैं औगुण होत हैं, तुम पूरण प्रतिपाल ॥ ३ ॥ जब मोहन प्राणहि चलै, तब देही किहि काम । तुम जानत दादू का कहै, अब जनि छाड़ै राम ॥ ४ ॥ 426. चौताल विषम बार हरि अधार, करुणा बहु नामी । भक्ति भाव बेग आइ, भीड़ भंजन स्वामी ॥ टेक ॥ अंत अधार संत सुधार, सुन्दर सुखदाई । काम क्रोध काल ग्रसत,प्रकटो हरि आई ॥ १ ॥ पूरण प्रतिपाल कहिये, सुमिऱ्यां तैं आवै । भरम कर्म मोह लागे, काहे न छुड़ावै ॥ २ ॥ दीनदयालु होहु कृपालु, अंतरयामी कहिये । एक जीव अनेक लागे, कैसे दुख सहिये ॥ ३ ॥

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