भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

अव्वल आखिर एक तूँ ही, जिन्द है कुरबान । आशिकां दीदार दादू, नूर का नीशान ॥ 4 ॥ 422. (फारसी) विरह विनती। (राग काफी) वर्ण भिन्न ताल अल्लह तेरा ज़िकर फ़िकर करते हैं, आशिकां मुश्ताक तेरे, तर्स तर्स मरते हैं ॥ टेक ॥ खलक खेश दिगर नेस्त, बैठे दिन भरते हैं। दायम दरबार तेरे, गैर महल डरते हैं ॥ 1 ॥ तन शहीद मन शहीद, रात दिवस लड़ते हैं। ज्ञान तेरा ध्यान तेरा, इश्क आग जलते हैं ॥ 2 ॥ जान तेरा जिन्द तेरा, पाँवों सिर धरते हैं। दादू दीवान तेरा, जर खरीद घर के हैं ॥ 3 ॥ 423. गज ताल मुख बोल स्वामी तूँ अन्तर्यामी, तेरा शब्द सुहावै राम जी ॥ टेक ॥ धेनु चरावन बेनु बजावन, दर्श दिखावन कामिनी ॥ 1 ॥ विरह उपावन तम बुझावन, अंगि लगावन भामिनी ॥ 2 ॥ संग खिलावन रास बनावन, गोपी भावन भूधरा ॥ 3 ॥ दादू तारन दुरित निवारण, संत सुधारण राम जी ॥ 4 ॥ 424. केवल विनती। गज ताल हाथ दे हो रामा, तुम सब पूरण कामा, हौं तो उरझ रह्यो संसार ॥ टेक ॥ अंध कूप गृह में पर्यो, मेरी करहु सँभाल। तुम बिन दूजा को नहीं, मेरे दीनानाथ दयाल ॥ 1 ॥ मारग को सूझै नहीं, दह दिशि माया जाल। काल पाश कसि बाँधियो, मेरे कोई न छुड़ावनहार ॥ 2 ॥