भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 मगन गलित अरस परस, दादू रस माता ॥ 3 ॥ 434. विनती । त्रिताल गोविन्द के चरणों ही ल्यौ लाऊँ। जैसे चातक बन में बोलै, पीव पीव कर ध्याऊँ ॥ टेक ॥ सुरजन मेरी सुनहु वीनती, मैं बलि तेरे जाऊँ। विपति हमारी तोहि सुनाऊँ, दे दर्शन क्यों हि पाऊँ ॥ 1 ॥ जात दुख, सुख उपजत तन को, तुम शरणागति आऊँ। दादू को दया कर दीजे, नाँव तुम्हारो गाऊँ ॥ 2 ॥ 435. त्रिताल ए ! प्रेम भक्ति बिन रह्यो न जाई, परगट दरसन देहु अघाई ॥ टेक ॥ तालाबेली तलफै माँही, तुम बिन राम जियरे जक नांही। निशिवासर मन रहै उदासा, मैं जन व्याकुल श्वासों श्वासा ॥ 1 ॥ एकमेक रस होइ न आवै, तातैं प्राण बहुत दुख पावै। अंग संग मिल यहु सुख दीजे, दादू राम रसायन पीजे ॥ 2 ॥ 436. परिचय उपदेश । पंजाबी त्रिताल तिस घरि जाना वे, जहाँ वे अकल स्वरूप, सोइ इब ध्याइये रे, सब देवन का भूप ॥ टेक ॥ अकल स्वरूप पीव का, बान बरन न पाइये। अखंड मंडल माँहि रहै, सोई प्रीतम गाइये ॥ गावहु मन विचारा वे, मन विचारा सोई सारा, प्रकट पीव ते पाइये। सांई सेती संग साचा, जीवित तिस घर जाइये ॥ 1 ॥ अकल स्वरूप पीव का, कैसे करि आलेखिये। शून्य मंडल माँहि साचा, नैन भर सो देखिये ॥

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