भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-राग धना श्री 27 झूठ न भावै, फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥ पंथ दुहेला, जाइ अकेला, भार न लीजी रे । दादू मेला, होइ सुहेला, सो कुछ कीजी रे ॥ ४ ॥ ५३२. दीप चन्दी डरिये रे डरिये, देख देख पग धरिये । तारे तरिये, मारे मरिये, तातैं गर्व न करिये रे, डरिये ॥ टेक ॥ देवै लेवै, समर्थ दाता, सब कुछ छाजै रे । तारै मारै, गर्व निवारै, बैठा गाजै रे ॥ १ ॥ राखैं रहिये, बाहैं बहिये, अनत न लहिये रे । भानै घड़ै, संवारै आपै, ऐसा कहिये रे ॥ २ ॥ निकट बुलावै, दूर पठावै, सब बन आवै रे । पाके काचे, काचे पाके, ज्यूं मन भावै रे ॥ ३ ॥ पावक पाणी, पाणी पावक, कर दिखलावै रे । लोहा कंचन, कंचन लोहा, कहि समझावै रे ॥ ४ ॥ शशहर सूर, सूर तैं शशहर, परगट खेलै रे । धरती अंबर, अंबर धरती, दादू मेलै रे ॥ ५ ॥ ५३३. हित उपदेश। चौताल मनसा मन शब्द सुरति, पाँचों थिर कीजे । एक अंग सदा संग, सहजैं रस पीजे ॥ टेक ॥ सकल रहित मूल गहित, आपा नहिं जानें । अन्तर गति निर्मल रति, ऐकै मन मानैं ॥ १ ॥ हिरदै सुधि विमल बुधि, पूरण परकासै । रसना निज नाम निरख, अन्तर गति वासै ॥ २ ॥ आत्म मति पूरण गति, प्रेम भगति राता ।

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