सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 ना वह मिलै, न हम सुखी, कहो क्यों जीवन होइ। जिन मुझको घायल किया, मेरी दारु सोइ ॥ 15 ॥ दर्शन कारण विरहनी, वैरागिन होवै। दादू विरह बियोगिनी, हरि मारग जोवै ॥ 16 ॥ विरह उपदेश अति गति आतुर मिलन को, जैसे जल बिन मीन। सो देखे दीदार को, दादू आतम लीन ॥ 17 ॥ राम बिछोही विरहनी, फिरि मिलन न पावै। दादू तलपै मीन ज्यूं, तुझ दया न आवै ॥ 18 ॥ दादू जब लग सुरति सिमिटै नहीं, मन निश्चल नहीं होहि। तब लग पीव परसै नहीं, बड़ी विपति यहु मोहि ॥ 19 ॥ ज्यूं अमली के चित अमल है, सूरे के संग्राम। निर्धन के चित धन बसै, यों दादू के राम ॥ 20 ॥ ज्यूं चातक के चित जल बसैं, ज्यूं पानी बिन मीन। जैसे चंद चकोर है, ऐसे दादू हरि सौं कीन ॥ 21 ॥ ज्यूं कुंजर के मन वन बसै, अनल पंखी आकास। यूं दादू का मन राम सौं, ज्यूं वैरागी वनखंड वास ॥ 22 ॥ भँवरा लुब्धी बास का, मोह्या नाद कुरंग। यों दादू का मन राम सौं, ज्यों दीपक ज्योति पंतग ॥ 23 ॥ श्रवणा राते नाद सौं, नैनां राते रूप। जिभ्या राती स्वाद सौं, त्यों दादू एक अनूप ॥ 24 ॥ विरह उपदेश देह पियारी जीव को, निशदिन सेवा मांहि। दादू जीवन मरण लौं, कबहूं छाड़ी नांहि ॥ 25 ॥
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