सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 504 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-स्मरण का अंग 2 दादू तप्त बिना तन प्रीति न ऊपजै, संग ही शीतल छाया। जनम लगै जीव जाणै नाही, तरवर त्रिभुवन राया ।। 103 ।। दादू चोट बिना तन प्रीति न ऊपजै, औषध अंग रहंत। जनम लगै जीव पलक न परसै, बूटी अमर अनंत ।। 104 ।। दादू चोट न लागी विरह की, पीड़ न उपजी आइ। जागै न रोवै धाह दे, सोवत गई बिहाइ ।। 105 ।। दादू पीड़ न ऊपजी, ना हम करी पुकार। ताथैं साहिब ना मिल्या, दादू बीती बार ।। 106 ।। अंदर पीड़ न ऊभरै, बाहर करै पुकार। दादू सो क्यों करि लहै, साहिब का दीदार ।। 107 ।। मन ही मांही झूरणां, रोवै मन ही मांहिं। मन ही मांहीं धाह दे, दादू बाहर नांहिं ।। 108 ।। बिन ही नैनहुँ रोवाणां, बिन मुख पीड़ पुकार। बिन ही हाथों पीटणां, दादू बारम्बार ।। 109 ।। प्रीति न उपजै विरह बिन, प्रेम भक्ति क्यों होइ। सब झूठै दादू भाव बिन, कोटि करे जे कोइ ।। 110 ।। दादू बातों विरह न ऊपजै, बातों प्रीति न होइ। बातों प्रेम न पाइये, जनि रू पतीजै कोइ ।। 111 ।। विरह उपदेश दादू तो पीव पाइये, कश्मल है सो जाइ। निर्मल मन कर आरसी, मूरति मांहि लखाइ ।। 112 ।। दादू तो पीव पाइये, कर मंझे विलाप। सुनि है कबहुँ चित्त धरि, परगट होवै आप ।। 113 ।। दादू तो पीव पाइये, कर सांई की सेव। काया मांहि लखाइसी, घट ही भीतर देव ।। 114 ।।
- 65 -