सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू बिन रसना जहँ बोलिये, तहँ अंतरयामी आप । बिन श्रवणहुँ सांई सुनै, जे कुछ कीजे जाप ॥ 28 ॥ परिचय जिज्ञासु उपदेश ज्ञान लहर जहाँ थैं उठै, वाणी का परकास । अनुभव जहाँ थैं उपजे, शब्दैं किया निवास ॥ 29 ॥ सो घर सदा विचार का, तहाँ निरंजन वास । तहँ तूँ दादू खोजि ले, ब्रह्म जीव के पास ॥ 30 ॥ जहाँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार । अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥ 31 ॥ भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार । तहँ दादू निधि पाइये, निरंतर निरधार ॥ 32 ॥ एक ठौर सूझै सदा, निकट निरन्तर ठाउँ । तहाँ निरंजन पूरि ले, अजरावर तिहिं नाउँ ॥ 33 ॥ साधु जन क्रीला करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव । चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥ 34 ॥ दादू पसु पिरंनि के, पेही मंझि कलूब । बैठो आहे बीच में, पाण जो महबूब ॥ 35 ॥ नैनहुँ वाला निरखि करि, दादू घालै हाथ । तब ही पावै रामधन, निकट निरंजन नाथ ॥ 36 ॥ नैनहुँ बिन सूझे नहीं, भूला कतहूँ जाइ । दादू धन पावै नहीं, आया मूल गँवाइ ॥ 37 ॥ परिचय लै लक्षण सहज जहाँ आत्म तहाँ राम है, सकल रह्या भरपूर । अंतरगति लयौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 38 ॥
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