सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 परिचय जिज्ञासु उपदेश पहली लोचन दीजिये, पीछे ब्रह्म दिखाइ । दादू सूझै सार सब, सुख में रहे समाइ ॥ 39 ॥ आंधी के आनन्द हुआ, नैनहुँ सूझन लाग । दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥ 40 ॥ दादू मिहीं महल बारीक है, गाँव न ठाँव न नाँव । तासों मन लागा रहै, मैं बलिहारी जाँव ॥ 41 ॥ दादू खेल्या चाहै प्रेम रस, आलम अंगि लगाइ । दूजे को ठाहर नहीं, पुहुप न गंध समाइ ॥ 42 ॥ नाहीं ह्वै करि नाम ले, कुछ न कहाई रे । साहिब जी की सेज पर, दादू जाई रे ॥ 43 ॥ जहाँ राम तहँ मैं नहीं, मैं तहँ नाहीं राम । दादू महल बारीक है, द्वै को नाहीं ठाम ॥ 44 ॥ मैं नाहीं तहँ मैं गया, एकै दूसर नाहीं । नाहीं को ठाहर घणी, दादू निज घर माहिं ॥ 45 ॥ दादू मैं नाहीं तहँ मैं गया, आगे एक अलाव । दादू ऐसी बंदगी, दूजा नाहीं आव ॥ 46 ॥ दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होइ । जब यहु आपा मिट गया, तब दूजा नाहीं कोइ ॥ 47 ॥ दादू मैं नाहीं तब एक है, मैं आई तब दोइ । मैं तैं पड़दा मिट गया, तब ज्यूं था त्यूं ही होइ ॥ 48 ॥ दादू है को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं । दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥ 49 ॥ परिचय दादू तीन शून्य आकार की, चौथी निर्गुण नाम । सहज शून्य में रमि रह्या, जहाँ तहाँ सब ठाम ॥ 50 ॥
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