सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 काया शून्य पंच का बासा, आत्म शून्य प्राण प्रकासा। परम शून्य ब्रह्म सौं मेला, आगे दादू आप अकेला ॥ 51 ॥ पाँच तत्त्व के पांच हैं, आठ तत्त्व के आठ। आठ तत्त्व का एक है, तहाँ निरंजन हाट ॥ 52 ॥ जहाँ मन माया ब्रह्म था, गुण इन्द्रिय आकार। तहँ मन बिरचै सबनि थैं, रचि रहु सिरजनहार ॥ 53 ॥ दादू जहाँ थैं सब ऊपजै, चंद सूर आकाश। पानी पवन पावक किये, धरती का प्रकाश ॥ 54 ॥ काल कर्म जीव ऊपजै, माया मन घट श्वास। तहँ रहता रमता राम है, सहज शून्य सब पास ॥ 55 ॥ सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं। तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥ 56 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, सो हंसा मोती चुणैं। पीवैं नीझर नीर, सो है हंसा सो सुणैं ॥ 57 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, जप तप संयम कीजिये। तहँ सनमुख सिरजनहार, प्रेम पिलावै पीजिये ॥ 58 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, संगी सबै सुहावणे। तहाँ बिन कर बाजै बैन, जिभ्या हीणे गावणे ॥ 59 ॥ दादू तिस सरवर के तीर, चरण कमल चित लाइया। तहँ आदि निरंजन पीव, भाग हमारे आइया ॥ 60 ॥ दादू सहज सरोवर आतमा, हंसा करै कलोल। सुख सागर सूभर भऱ्या, मुक्ताहल मन मोल ॥ 61 ॥ दादू हरि सरवर पूरण सबै, जित तित पाणी पीव। जहाँ तहाँ जल अचंतां, गई तृषा सुख जीव ॥ 62 ॥
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