भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 सुख सागर सूभर भर्या, उज्जवल निर्मल नीर। प्यास बिना पीवै नहीं, दादू सागर तीर ॥ 63 ॥ शून्य सरोवर हंस मन, मोती आप अनंत। दादू चुगि चुगि चंचुभरि, यौं जन जीवैं संत ॥ 64 ॥ शून्य सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव। दादू यहु रस विलसिये, ऐसा अलख अभेव ॥ 65 ॥ शून्य सरोवर मन भँवर, तहाँ कमल करतार। दादू परिमल पीजिए, सन्मुख सिरजनहार ॥ 66 ॥ शून्य सरोवर सहज का, तहँ मर जीवा मन। दादू चुणि चुणि लेयगा, भीतर राम रतन ॥ 67 ॥ दादू मंझि सरोवर विमल जल, हंसा केलि करांहि। मुक्ताहल मुक्ता चुगैं, तिहिं हंसा डर नांहि ॥ 68 ॥ अखंड सरोवर अथग जल, हंसा सरवर न्हाँहि। निर्भय पायाआप घर, अब उड़ि अनत न जांहि ॥ 69 ॥ दादू दरिया प्रेम का, तामें झूलैं दोइ। इक आतम परआतमा, एकमेक रस होइ ॥ 70 ॥ दादू हिण दरियाव, माणिक मंझेई। डुबि डेई पाण मैं, डिठो हंजेई ॥ 71 ॥ परआतम सौं आत्मा, ज्यूँ हंस सरोवर मांहि। हिलि मिलि खेलैं पीव सौं, दादू दूसर नांहि ॥ 72 ॥ दादू सरवर सहज का, तामें प्रेम तरंग। तहँ मन झूलै आत्मा, अपणे सांई संग ॥ 73 ॥ दादू देखौं निज पीव को, दूसर देखौं नांहि। सबै दिसा सौं सोधि करि, पाया घट ही मांहि ॥ 74 ॥

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