सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू देखौं निज पीव को, और न देखौं कोइ। पूरा देखौं पीव को, बाहिर भीतर सोइ ॥ 75 ॥ दादू देखौं निज पीव को, देखत हि दुख जाइ। हूँ तो देखौं पीव को, सब में रह्या समाइ ॥ 76 ॥ दादू देखौं निज पीव को, सोई देखन जोग। परगट देखौं पीव को, कहाँ बतावैं लोग ॥ 77 ॥ परिचय जिज्ञासु उपदेश दादू देखु दयालु को, सकल रह्या भरपूर। रोम रोम में रमि रह्या, तूँ जनि जानै दूर ॥ 78 ॥ दादू देखु दयालु को, बाहरि भीतरि सोइ। सब दिसि देखौं पीव को, दूसर नाहीं कोइ ॥ 79 ॥ दादू देखु दयालु को, सनमुख सांई सार। जीधरि देखौं नैन भरि, तीधरि सिरजनहार ॥ 80 ॥ दादू देखु दयालु को, रोक रह्या सब ठौर। घट घट मेरा सांइयाँ, तूँ जनि जानै और ॥ 81 ॥ उभै असमाव तन मन नाहीं, मैं नहीं, नहीं माया, नहीं जीव। दादू एकै देखिए, दह दिसि मेरा पीव ॥ 82 ॥ दादू पाणी मांहीं पैसि करि, देखै दृष्टि उघारि। जलाबिंब सब भरि रह्या, ऐसा ब्रह्म विचारि ॥ 83 ॥ सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर। दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥ 84 ॥ दादू जहाँ तहँ साथी संग है, मेरे सदा अनंद। नैन बैन हिरदै रहै, पूरण परमानंद ॥ 85 ॥ जागत जगपति देखिये, पूरण परमानंद। सोवत भी सांई मिलै, दादू अति आनन्द ॥ 86 ॥
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