सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल। चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥ 87 ॥ सूरज कोटि प्रकास है, रोम रोम की लार। दादू ज्योति जगदीश की, अंत न आवै पार ॥ 88 ॥ ज्यों रवि एक आकाश है, ऐसे सकल भरपूर। दादू तेज अनन्त है, अल्लह आली नूर ॥ 89 ॥ सूरज नहीं तहँ सूरज देख्या, चंद नहीं तहँ चन्दा। तारे नहीं तहँ झिलमिल देख्या, दादू अति आनन्दा ॥ 90 ॥ बादल नहीं तहँ बरषत देख्या, शब्द नहीं गरजंदा। बीज नहीं तहँ चमकत देख्या, दादू परमानन्दा ॥ 91 ॥ आत्म बेलीतरु दादू जोति चमकै झिलमिलै, तेज पुंज प्रकाश। अमृत झरै रस पीजिए, अमर बेलि आकाश ॥ 92 ॥ परिचय अंग दादू अविनाशी अंग तेज का, ऐसा तत्त्व अनूप। सो हम देख्या नैन भरि, सुन्दर सहज स्वरूप ॥ 93 ॥ परम तेज प्रगट भया, तहाँ मन रह्या समाइ। दादू खेलै पीव सौं, नहीं आवै नहीं जाइ ॥ 94 ॥ निराधार निज देखिये, नैनहुँ लागा बन्द। तहँ मन खेलै पीव सौं, दादू सदा आनन्द ॥ 95 ॥ आत्म बेलितरु ऐसा एक अनूप फल, बीज बाकुला नांहि। मीठा निर्मल एक रस, दादू नैनहुँ मांहि ॥ 96 ॥ परिचय हीरे हीरे तेज के, सो निरखै त्रय लोइ। कोइ इक देखै संत जन, और न देखै कोइ ॥ 97 ॥
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