भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 504 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 लै लक्षण सहज छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ। दादू ऐसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 162 ॥ सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ। दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥ 163 ॥ राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ। मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥ 164 ॥ जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और। देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥ 165 ॥ पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण। दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 166 ॥ तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण। जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 167 ॥ तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम। आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥ 168 ॥ नख शिख स्मरण कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ। मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥ 169 ॥ नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप। अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥ 170 ॥ अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि। सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥ 171 ॥ दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम। चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥ 172 ॥ दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत। अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥ 173 ॥

  • 86 -