सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 लै लक्षण सहज छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ। दादू ऐसैं मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 162 ॥ सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ। दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥ 163 ॥ राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ। मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥ 164 ॥ जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और। देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥ 165 ॥ पर आतम सौं आतमा, ज्यों पाणी में लूंण। दादू तन मन एक रस, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 166 ॥ तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों पाणी में लूंण। जीव ब्रह्म एकै भया, तब दूजा कहिये कूंण ॥ 167 ॥ तन मन विलै यों कीजिये, ज्यों घृत लागे घाम। आतम कमल तहँ बंदगी, जहँ दादू प्रकट राम ॥ 168 ॥ नख शिख स्मरण कोमल कमल तहँ पैसि कर, जहाँ न देखै कोइ। मन थिर सुमिरण कीजिये, तब दादू दर्शन होइ ॥ 169 ॥ नखसिख सब सुमिरण करैं, ऐसा कहिये जाप। अन्तर बिगसै आत्मा, तब दादू प्रगटै आप ॥ 170 ॥ अंतरगत हरि हरि करे, तब मुख की हाजत नांहि। सहजैं धुनि लागी रहै, दादू मन ही मांहि ॥ 171 ॥ दादू सहजैं सुमिरण होत है, रोम रोम रमि राम। चित्त चहूँट्या चित्त सौं, यों लीजे हरि नाम ॥ 172 ॥ दादू सुमिरण सहज का, दीन्हा आप अनंत। अरस परस उस एक सौं, खेलैं सदा बसंत ॥ 173 ॥
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