भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

दादू शब्द अनाहद हम सुन्या, नखसिख सकल शरीर । सब घट हरि हरि होत है, सहजैं ही मन थीर ॥ 174 ॥ हुण दिल लग्गा हिकसां, मे कूं येहा ताति । दादू कम्म खुदाय दे, बैठा डी है राति ॥ 175 ॥ दादू माला सब आकार की, कोई साधु सुमिरै राम । करणी कर तैं क्या किया, ऐसा तेरा नाम ॥ 176 ॥ सब घट मुख रसना करै, रटै राम का नाम । दादू पीवै रामरस, अगम अगोचर ठाम ॥ 177 ॥ दादू मन चित सुस्थिर कीजिये, तो नख सिख सुमिरण होइ । श्रवण नेत्र मुख नासिका, पंचों पूरे सोइ ॥ 178 ॥ साध महिमा आतम आसन राम का, तहाँ बसै भगवान । दादू दोन्यूं परस्पर, हरि आतम का थान ॥ 179 ॥ राम जपै रुचि साधु को, साधु जपै रुचि राम । दादू दोनों एक टग, यहु आरम्भ यहु काम ॥ 180 ॥ जहाँ राम तहाँ संतजन, जहाँ साधु तहाँ राम । दादू दोन्यूं इकट्ठे, अरस परस विश्राम ॥ 181 ॥ दादू हरि साधु यों पाइये, अविगति के आराध । साधु संगति हरि मिलै, हरि संगति तैं साध ॥ 182 ॥ दादू राम नाम सौं मिलि रहै, मन के छाड़ि विकार । तो दिल ही माँहैं देखिये, दोनों का दीदार ॥ 183 ॥ साधु समाना राम में, राम रह्या भरपूर । दादू दोनों एक रस, क्यों कर कीजै दूर ॥ 184 ॥ सत्संग महात्म दादू सेवक सांई का भया, तब सेवक का सब कोइ । सेवक सांई को मिल्या, तब सांई सरीखा होइ ॥ 185 ॥

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