सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि। ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥ 306 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब सब पड़दा दूर। ऐसैं मिल एकै भया, बहु दीपक पावक पूर ॥ 307 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख। नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक॥ 308 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब पलक न पड़दा कोइ। डाल मूल फल बीज में, सब मिल एकै होइ ॥ 309 ॥ फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि। सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥ 310 ॥ दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सौं पाइ। हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥ 311 ॥ टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबरि होइ। परगट खेलै पीव सौं, दादू बिरला कोइ ॥ 312 ॥ दादू निबरा ना रहै, ब्रह्म सरीखा होइ। लै समाधि रस पीजिये, दादू जब लग दोइ ॥ 313 ॥ बेखुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पैमाल। बेकीमत मस्तान गलतान, नूर प्याले ख्याल ॥ 314 ॥ दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ। अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥ 315 ॥ पीया तेता सुख भया, बाकी बहु वैराग। ऐसे जन थाके नहीं, दादू उनमनि लाग ॥ 316 ॥ निकट निरंजन लाग रघु, जब लग अलख अभेव। दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 317 ॥
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