सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति प्राण खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन । शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥ 294 ॥ चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन । नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥ 295 ॥ पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार । खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥ 296 ॥ नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज । ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥ 297 ॥ पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ । आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥ 298 ॥ अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ । दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥ 299 ॥ दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा । आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥ 300 ॥ प्राण पवन मन मगन है, संगी सदा निवासा । परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥ 301 ॥ दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि । पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥ 302 ॥ प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये । पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौँ कहिये ॥ 303 ॥ पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये । दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥ 304 ॥ दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्ष्म जैसा अंग । पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥ 305 ॥
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