भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 जीव पियारे राम को, पाती पंच चढ़ाइ। तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥ 282 ॥ अध्यात्म ध्यान शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि। मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥ 283 ॥ दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर। जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥ 284 ॥ दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि। निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥ 285 ॥ मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि। दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 286 ॥ दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ। मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन-नाथ ॥ 287 ॥ दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण। यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥ 288 ॥ दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान। सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥ 289 ॥ दादू दृष्टैं दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ। समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥ 290 ॥ दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तैं भक्ति समान। प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥ 291 ॥ दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन। मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥ 292 ॥ जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ। जहाँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥ 293 ॥

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