भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 जीव पियारे राम को, पाती पंच चढ़ाइ। तन मन मनसा सौंपि सब, दादू विलम्ब न लाइ ॥ 282 ॥ अध्यात्म ध्यान शब्द सुरति लै सान चित्त, तन मन मनसा मांहि। मति बुद्धि पंचों आतमा, दादू अनत न जांहि ॥ 283 ॥ दादू तन मन पवना पंच गहि, ले राखै निज ठौर। जहाँ अकेला आप है, दूजा नांही और ॥ 284 ॥ दादू यहु मन सुरति समेट करि, पंच अपूठे आणि। निकटि निरंजन लाग रहु, संगि सनेही जाणि ॥ 285 ॥ मन चित मनसा आत्मा, सहज सुरति ता मांहि। दादू पंचों पूर ले, जहँ धरती अंबर नांहि ॥ 286 ॥ दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ। मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन-नाथ ॥ 287 ॥ दादू शब्दैं शब्द समाइ ले, पर आतम सौं प्राण। यहु मन मन सौं बंधि ले, चित्तैं चित्त सुजान ॥ 288 ॥ दादू सहजैं सहज समाइ ले, ज्ञानैं बंध्या ज्ञान। सूत्रैं सूत्र समाइ ले, ध्यानैं बंध्या ध्यान ॥ 289 ॥ दादू दृष्टैं दृष्टि समाइ ले, सुरतैं सुरति समाइ। समझैं समझ समाइ ले, लै सौं लै ले लाइ ॥ 290 ॥ दादू भावैं भाव समाइ ले, भक्तैं भक्ति समान। प्रेमैं प्रेम समाइ ले, प्रीतैं प्रीति रस पान ॥ 291 ॥ दादू सूरतैं सुरति समाइ रहु, अरु बैनहुं सौं बैन। मन ही सौं मन लाइ रहु, अरु नैनहुँ सौं नैन ॥ 292 ॥ जहाँ राम तहँ मन गया, मन तहँ नैना जाइ। जहाँ नैना तहँ आतमा, दादू सहजि समाइ ॥ 293 ॥

  • 97 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 जीवन मुक्ति, विषय वासना निवृत्ति प्राण खेलै प्राण सौं, मनन खेलै मन । शब्दन खेलै शब्द सौं, दादू राम रतन ॥ 294 ॥ चित्तन खेलै चित्त सौं, बैनन खेलै बैन । नैनन खेलै नैन सौं, दादू प्रकट ऐन ॥ 295 ॥ पाकन खेलै पाक सौं, सारन खेलै सार । खूबन खेलै खूब सौं, दादू अंग अपार ॥ 296 ॥ नूर न खेलै नूर सौं, तेज न खेलै तेज । ज्योतिन खेलै ज्योति सौं, दादू एकै सेज ॥ 297 ॥ पंच पदारथ मन रतन, पवना माणिक होइ । आतम हीरा सुरति सौं, मनसा मोती पोइ ॥ 298 ॥ अजब अनूपम हार है, सांई सरीषा सोइ । दादू आतम राम गल, जहाँ न देखे कोइ ॥ 299 ॥ दादू पंचों संगी संग ले, आये आकासा । आसन अमर अलेख का, निर्गुण नित वासा ॥ 300 ॥ प्राण पवन मन मगन है, संगी सदा निवासा । परचा परम दयालु सौं, सहजैं सुख दासा ॥ 301 ॥ दादू प्राण पवन मन मणि बसै, त्रिकुटि केरे संधि । पाँचों इन्द्री पीव सौं, ले चरणों में बंधि ॥ 302 ॥ प्राण हमारा पीव सौं, यों लागा सहिये । पुहुप वास घृत दूध में, अब कासौँ कहिये ॥ 303 ॥ पाहण लोह बिच वासदेव, ऐसे मिल रहिये । दादू दीन दयाल सौं, संग हि सुख लहिये ॥ 304 ॥ दादू ऐसा बड़ा अगाध है, सूक्ष्म जैसा अंग । पुहुप वास तैं पतला, सो सदा हमारे संग ॥ 305 ॥

  • 98 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर कुछ नांहि। ज्यों पाला पाणी कों मिल्या, त्यों हरिजन हरि मांहि ॥ 306 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब सब पड़दा दूर। ऐसैं मिल एकै भया, बहु दीपक पावक पूर ॥ 307 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख। नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक॥ 308 ॥ दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब पलक न पड़दा कोइ। डाल मूल फल बीज में, सब मिल एकै होइ ॥ 309 ॥ फल पाका बेली तजी, छिटकाया मुख मांहि। सांई अपना कर लिया, सो फिर ऊगै नांहि ॥ 310 ॥ दादू काया कटोरा दूध मन, प्रेम प्रीति सौं पाइ। हरि साहिब इहि विधि अंचवै, वेगा वार न लाइ ॥ 311 ॥ टगा टगी जीवन मरण, ब्रह्म बराबरि होइ। परगट खेलै पीव सौं, दादू बिरला कोइ ॥ 312 ॥ दादू निबरा ना रहै, ब्रह्म सरीखा होइ। लै समाधि रस पीजिये, दादू जब लग दोइ ॥ 313 ॥ बेखुद खबर होशियार बाशद, खुद खबर पैमाल। बेकीमत मस्तान गलतान, नूर प्याले ख्याल ॥ 314 ॥ दादू माता प्रेम का, रस में रह्या समाइ। अन्त न आवै जब लगै, तब लग पीवत जाइ ॥ 315 ॥ पीया तेता सुख भया, बाकी बहु वैराग। ऐसे जन थाके नहीं, दादू उनमनि लाग ॥ 316 ॥ निकट निरंजन लाग रघु, जब लग अलख अभेव। दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥ 317 ॥

  • 99 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

राम रतणि छाड़ै नहीं, हरि लै लागा जाइ । बीचैं ही अटकै नहीं, कला कोटि दिखलाइ ॥ 318 ॥ दादू हरि रस पीवतां, कबहुँ अरुचि न होइ । पीवत प्यासा नित नवा, पीवणहारा सोइ ॥ 319 ॥ दादू जैसे श्रवणा दोइ हैं, ऐसे होंहि अपार । राम कथा रस पीजिये, दादू बारंबार ॥ 320 ॥ जैसे नैना दोइ हैं, ऐसे होंहि अनंत । दादू चंद चकोर ज्यों, रस पीवैं भगवंत ॥ 321 ॥ ज्यों रसना मुख एक है, ऐसे होंहि अनेक। तो रस पीवै शेष ज्यों, यों मुख मीठा एक ॥ 322 ॥ ज्यों घट आत्म एक है, ऐसे होंहि असंख । भर भर राखै रामरस, दादू एकै अंक ॥ 323 ॥ ज्यों ज्यों पीवै राम रस, त्यों त्यों बढै पियास । ऐसा कोई एक है, बिरला दादू दास ॥ 324 ॥ राता माता राम का, मतवाला मैमंत । दादू पीवत क्यों रहै, जे जुग जांहि अनन्त ॥ 325 ॥ दादू निर्मल ज्योति जल, वर्षा बारह मास । तिहि रस राता प्राणिया, माता प्रेम पियास ॥ 326 ॥ रोम रोम रस पीजिए, एती रसना होइ । दादू प्यासा प्रेम का, यों बिन तृप्ति न होइ ॥ 327 ॥ तन गृह छाड़ै लाज पति, जब रस माता होइ । जब लग दादू सावधान, कदे न छाड़े कोइ ॥ 328 ॥ आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहि । दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥ 329 ॥

  • 100 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

पीवत चेतन जब लगै, तब लग लेवै आइ। जब माता दादू प्रेम रस, तब काहे को जाइ ॥ 330 ॥ दादू अंतर आत्मा, पीवै हरि जल नीर। सौंज सकल ले उद्धरै, निर्मल होइ शरीर ॥ 331 ॥ लांबी रस दादू मीठा राम रस, एक घूँट कर जाऊँ। पुणग न पीछे को रहे, सब हिरदै मांहि समाऊँ ॥ 332 ॥ चिड़ी चंचु भरि ले गई, नीर निघट नहिं जाइ। ऐसा बासण ना किया, सब दरिया मांहि समाइ ॥ 333 ॥ दादू अमली राम का, रस बिन रह्या न जाइ। पलक एक पावै नहीं, तो तबहिं तलफ मर जाइ ॥ 334 ॥ दादू राता राम का, पीवै प्रेम अघाइ। मतवाला दीदार का, मांगै मुक्ति बलाइ ॥ 335 ॥ उज्जवल भँवरा हरि कमल, रस रुचि बारह मास। पीवै निर्मल वासना, सो दादू निज दास ॥ 336 ॥ नैनहुँ सौं रस पीजिये, दादू सुरति सहेत। तन मन मंगल होत है, हरि सौं लागा हेत ॥ 337 ॥ पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार। दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥ 338 ॥ नाना विधि पिया राम रस, केती भाँति अनेक। दादू बहुत विवेक सौं, आत्म अविगत एक॥ 339 ॥ परिचय महात्म परिचय का पय प्रेम रस, जे कोई पीवै। मतवाला माता रहै, यों दादू जीवै ॥ 340 ॥ परिचय का पय प्रेम रस, पीवै हित चित लाइ। मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 341 ॥

  • 101 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4

परिचय पीवै राम रस, युग युग सुस्थिर होइ। दादू अविचल आतमा, काल न लागै कोइ ॥ 342 ॥ परिचय पीवै राम रस, सो अविनाशी अंग। काल मीच लागै नहीं, दादू सांई संग ॥ 343 ॥ परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ। मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ 344 ॥ परिचय पीवै राम रस, राता सिरजनहार। दादू कुछ व्यापै नहीं, ते छूटे संसार ॥ 345 ॥ अमृत भोजन राम रस, काहे न विलसै खाइ। काल विचारा क्या करै, रम रम राम समाइ ॥ 346 ॥ सजीवन दादू जीव अजा बिघ काल है, छेली जाया सोइ। जब कुछ बस नहीं काल का, तब मीनी का मुख होइ ॥ 347 ॥ मन लवरू के पंख हैं, उनमनि चढै आकास। पग रहि पूरे साच के, रोपि रह्या हरि पास ॥ 348 ॥ तन मन वृक्ष बबूल का, कांटे लागे सूल। दादू माखण ह्रै गया, काहू का स्थूल ॥ 349 ॥ दादू संषा शब्द है, सुनहाँ संशा मारि। मन मींडक सूं मारिये, शंका सर्प निवारि ॥ 350 ॥ दादू गांझी ज्ञान है, भंजन है सब लोक। राम दूध सब भरि रह्या, ऐसा अमृत पोष ॥ 351 ॥ दादू झूठा जीव है, गढ़िया गोविन्द बैन। मनसा मूंगी पंखि सौं, सूरज सरीखे नैन ॥ 352 ॥ सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार। दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ 353 ॥

  • 102 -

श्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य चतुर्थो परिचय का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 4 ॥ साखी 353 ॥ दादूराम राम सत्यराम

  • 103 -

जरणा का अंग www.dadooram.org अथ जरणा का अंग ५ मंगलाचरण दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगततः ।। 1 ।। जरणा का स्वरूप को साधु राखै रामधन, गुरु बाइक वचन विचार । गहिला दादू क्यों रहै, मरकत हाथ गँवार ।। 2 ।। जनि खोवै दादू रामधन, हिरदै राखि जनि जाइ । रतन जतन करि राखिये, चिंतामणि चित लाइ ।। 3 ।। दादू मन ही मांहि समझ कर, मन ही मांहि समाइ । मन ही मांहि राखिये, बाहर कहि न जनाइ ।। 4 ।।

  • 104 -

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5 दादू समझ समाइ रहु, बाहरि कहि न जनाइ। दादू अद्भुत देखिया, तहँ ना को आवै जाइ ॥ 5 ॥ कहि कहि क्या दिखलाइये, सांई सब जाने। दादू प्रगट क्या कहै, कुछ समझि सयाने ॥ 6 ॥ दादू मन हीं मांहैं ऊपजै, मन ही मांहि समाइ। मन ही मांहैं राखिये, बाहर कहि न जनाइ ॥ 7 ॥ जरणा करने की विधि लै विचार लागा रहै, दादू जरता जाइ। कबहुँ पेट न आफरै, भावै तेता खाइ ॥ 8 ॥ सोइ सेवक सब जरै, जेती उपजै आइ। कहि न जनावै और को, दादू मांहि समाइ ॥ 9 ॥ सोइ सेवग सब जरै, जेता रस पीया। दादू गुझ गंभीर का, प्रकाश न कीया ॥ 10 ॥ सोई सेवक सब जरै, जे अलख लखावा। दादू राखै रामधन, जेता कुछ पावा ॥ 11 ॥ सोइ सेवक सब जरै, प्रेम रस खेला। दादू सो सुख कस कहै, जहाँ आप अकेला ॥ 12 ॥ सोई सेवक सब जरै, जेता घट परकास। दादू सेवक सब लखै, कहि न जनावै दास ॥ 13 ॥ अजर जरै रस ना झरै, घट मांहि समावै। दादू सेवक सो भला, जे कहि न जनावै ॥ 14 ॥ अजर जरै रस ना झरै, घट अपना भर लेइ। दादू सेवक सो भला, जारै जाण न देइ ॥ 15 ॥ अजर जरै रस ना झरै, जेता सब पीवै। दादू सेवक सो भला, राखै रस जीवै ॥ 16 ॥

  • 105 -

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5 अजर जरै रस ना झरै, पीवत थाकै नांहि। दादू सेवक सो भला, भर राखै घट मांहि ॥ 17 ॥ साधु महिमा जरणा जोगी जुग जुग जीवै, झरणा मर मर जाइ। दादू जोगी गुरुमुखी, सहजैं रहै समाइ ॥ 18 ॥ जरणा जोगी जग रहै, झरणा परलै होइ। दादू जोगी गुरुमुखी, सहज समाना सोइ ॥ 19 ॥ जरणा जोगी थिर रहै, झरणा घट फूटै। दादू जोगी गुरुमुखी, काल थैं छूटै ॥ 20 ॥ जरणा जोगी जगपती, अविनाशी अवधूत। दादू जोगी गुरुमुखी, निरंजन का पूत ॥ 21 ॥ जरै सु नाथ निरंजन बाबा, जरै सु अलख अभेव। जरै सु जोगी सब की जीवन, जरै सु जग में देव ॥ 22 ॥ जरै सु आप उपावनहारा, जरै सु जगपति सांईं। जरै सु अलख अनूप है, जरै सु मरणा नांहीं ॥ 23 ॥ जरै सु अविचल राम है, जरै सु अमर अलेख। जरै सु अविगत आप है, जरै सु जग में एक ॥ 24 ॥ जरै सु अविगत आप है, जरै सु अपरम्पार। जरै सु अगम अगाध है, जरै सु सिरजनहार ॥ 25 ॥ जरै सु निज निराकार है, जरै सु निज निरधार। जरै सु निज निर्गुणमयी, जरै सु निज तत सार ॥ 26 ॥ जरै सु पूरण ब्रह्म है, जरै सु पूरणहार। जरै सु पूरण परमगुरु, जरै सु प्राण हमार ॥ 27 ॥ दादू जरै सु ज्योति स्वरूप है, जरै सु तेज अनन्त। जरै सु झिलमिल नूर है, जरै सु पुंज रहंत ॥ 28 ॥

  • 106 -

श्री दादूवाणी-जरणा का अंग 5 दादू जरै सु परम प्रकाश है, जरै सु परम उजास । जरै सु परम उदीत है, जरै सु परम विलास ॥ 29 ॥ दादू जरै सु परम पगार है, जरै सु परम विगास । जरै सु परम प्रभास है, जरै सु परम निवास ॥ 30 ॥ परमेश्वर की दयालुता दादू एक बोल भूले हरि, सो कोई न जाणै प्राण । औगुण मन आणै नहिं, और सब जाणै हरि जाण ॥ 31 ॥ सतगुरु अगम बात जानने के लिए विनय करते हैं दादू तुम जीवों के औगुण तजे, सु कारण कौन अगाध ? मेरी जरणा देख कर, मति को सीखें साध ॥ 32 ॥ धारणा पवना पानी सब पिया, धरती अरु आकास । चन्द सूर पावक मिले, पंचों एक ग्रास ॥ 33 ॥ चौदह तीनों लोक सब, ढूंगे श्वासै श्वास । दादू साधू सब जरैं, सतगुरु के विश्वास ॥ 34 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य पांचवां जरणा का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 5 ॥ साखी 34 ॥

  • 107 -

हैरान का अंग अथ हैरान का अंग ६ दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ रतन एक बहु पारिखू, सब मिल करैं विचार । गूं गे गहिले बावरे, दादू वार न पार ॥ 2 ॥ अनेक मतवादी केते पारिख जौहरी, पंडित ज्ञाता ध्यान । जाण्या जाइ न जानिए, का कहि कथिये ज्ञान ॥ 3 ॥ केते पारिख पच मुये, कीमत कही न जाइ । दादू सब हैरान हैं, गूँगे का गुड़ खाइ ॥ 4 ॥

  • 108 -

श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6 सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरझाइ । दादू गति गोविन्द की, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 5 ॥ जैसा है तैसा नाम तुम्हारा, ज्यों है त्यों कह सांई । तूं आपै जाणै आपको, तहँ मेरी गम नांहि ॥ 6 ॥ केते पारिख अंत न पावैं, अगम अगोचर मांही । दादू कीमत कोई न जानै, खीर नीर की नांही ॥ 7 ॥ जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबर होइ । दादू जाणै ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोइ ॥ 8 ॥ वारपार को ना लहै, कीमत लेखा नांहि । दादू एकै नूर है, तेज पुंज सब मांहि ॥ 9 ॥ पीव पिछान हस्त पांव नहिं शीश मुख, श्रवण नेत्र कहुं कैसा । दादू सब देखैं सुनैं, कहै गहै है ऐसा ॥ 10 ॥ ‘पाया पाया’ सब कहैं, केतक ‘देहुँ दिखाइ ।’ कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 11 ॥ अपना भंजन भर लिया, उहाँ उता ही जाण । अपणी अपणी सब कहैं, दादू बिड़द बखाण ॥ 12 ॥ पार न देवै आपना, गोप गूझ मन मांहि । दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 13 ॥ गूं गे का गुड़ का कहूँ, मन जानत है खाइ । त्यों राम रसायन पीवतां, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 14 ॥ दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध । वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥ 15 ॥ दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार । गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥ 16 ॥

  • 109 -

श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6 सकल शिरोमणि नाम है, तूं है तैसा नांहि। दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 17 ॥ दादू केते कह गये, अंत न आवै ओर । हमहूँ कहते जात हैं, केते कहसी होर ॥ 18 ॥ दादू मैं क्या जानूँ क्या कहूँ, उस बलिये की बात । क्या जानूँ क्यों ही रहै, मो पै लख्या न जात ॥ 19 ॥ दादू केते चल गये, थाके बहुत सुजान। बातों नाम न नीकले, दादू सब हैरान ॥ 20 ॥ ना कहीं दिट्ठा ना सुण्या, ना कोई आखणहार। ना कोई उत्थों थी फिऱ्या, ना उर वार न पार ॥ 21 ॥ परमार्थ स्वरूप नहिं मृतक नहिं जीवता, नहिं आवै नहिं जाइ। नहिं सूता नहिं जागता, नहिं भूखा नहिं खाइ ॥ 22 ॥ न तहाँ चुप ना बोलणां, मैं तैं नांहीं कोइ। दादू आपा पर नहीं, न तहाँ एक न दोइ ॥ 23 ॥ एक कहूँ तो दोइ हैं, दोइ कहूँ तो एक। यों दादू हैरान है, ज्यों है त्यों ही देख ॥ 24 ॥ देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान। वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥ 25 ॥ पतिव्रत निष्काम दादू करणहार जे कुछ किया, सोई हौं कर जाण। जे तूं चतुर सयाना जानराइ, तो याही परमाण ॥ 26 ॥ दादू जिन मोहनि बाजी रची, सो तुम्ह पूछो जाइ। अनेक एक तैं क्यों किये, साहिब कहि समझाइ ॥ 27 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्ति योगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा

  • 110 -

धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य छठा हैरान कअंग सम्पूर्ण ॥ अंग 6 ॥ साखी 27 ॥ दादूराम सत्यराम

  • 111 -

अथ लै का अंग ७ दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः । वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥ 1 ॥ लय का स्वरूप लक्षण दादू लै लागी तब जाणिये, जे कबहुँ छूट न जाइ । जीवत यों लागी रहै, मूवां मंझ समाइ ॥ 2 ॥ दादू जे नर प्राणी लै गता, सोई गत ह्वै जाइ । जे नर प्राणी लै रता, सो सहजैं रहै समाइ ॥ 3 ॥ सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाइ । आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥ 4 ॥

  • 112 -

श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाइ । जहाँ आत्म तहँ परमात्मा, दादू सहज समाइ ॥ 5 ॥ अर्थ अनुपम आप है, और अनर्थ भाई । दादू ऐसी जानि कर, तासौं ल्यौ लाई ॥ 6 ॥ लै लगाने की विधि ज्ञान भक्ति मन मूल गह, सहज प्रेम ल्यौ लाइ । दादू सब आरंभ तजि, जनि काहू संग जाइ ॥ 7 ॥ अगम संस्कार पहली था सो अब भया, अब सो आगे होइ । दादू तीनों ठौर की, बूझै बिरला कोइ ॥ 8 ॥ अध्यात्म योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजैं सहजैं आव । मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥ 9 ॥ सहज शून्य मन राखिये, इन दोनों के मांहि । लै समाधि रस पीजिये, तहाँ काल भय नांहि ॥ 10 ॥ दादू बिन पायन का पंथ है, क्यों कर पहुँचे प्राण । विकट घाट औखट खरे, मांहि शिखर असमान ॥ 11 ॥ मन ताजी चेतन चढै, ल्यौ की करै लगाम । शब्द गुरु का ताजणा, कोई पहुँचे साधु सुजान ॥ 12 ॥ सूक्ष्म मार्ग किहिं मारग ह्वै आइया, किहिं मारग ह्वै जाइ । दादू कोई ना लहै, केते करैं उपाइ ॥ 13 ॥ शून्य हि मार्ग आइया, शून्य हि मारग जाइ । चेतन पैंडा सुरति का, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 14 ॥ दादू पारब्रह्म पैंडा दिया, सहज सुरति लै सार । मन का मारग मांहि घर, संगी सिरजनहार ॥ 15 ॥

  • 113 -

श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 लय राम कहै जिस ज्ञान सौं, अमृत रस पीवै । दादू दूजा छाड़ि सब, लै लागी जीवै ॥ 16 ॥ राम रसायन पीवतां, जीव ब्रह्म ह्वै जाइ । दादू आत्म राम सौं, सदा रहै ल्यौ लाइ ॥ 17 ॥ रस रंग सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा। दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥ 18 ॥ अध्यात्म दादू जहाँ जगद्गुरु रहत है, तहाँ जे सुरति समाइ । तो इन ही नैनहुँ उलट कर, कौतुक देखै आइ ॥ 19 ॥ अख्यूं पसण के पिरी, भिरे उलथौं मंझ। जिते बैठो मां पिरी, निहारी दो हंझ ॥ 20 ॥ दादू उलट अनूठा आप में, अंतर सोध सुजाण । सो ढिग तेरे बावरे, तज बाहर की बाण ॥ 21 ॥ सुरति अपूठी फेरि कर, आत्म मांही आन । लाग रहै गुरुदेव सौं, दादू सोई सयान ॥ 22 ॥ सूक्ष्म सौंज अर्चा बंदगी जहाँ आत्म तहँ राम है, सकल रह्या भरपूर । अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, दादू सेवक सूर ॥ 23 ॥ दादू अन्तर्गत ल्यौ लाइ रहु, सदा सुरति सौं गाइ । यहु मन नाचै मगन ह्वै, भावै ताल बजाइ ॥ 24 ॥ दादू पावै सुरति सौं, बाणी बाजै ताल । यहु मन नाचै प्रेम सौं, आगे दीन दयाल ॥ 25 ॥ दादू सब बातन की एक है, दुनिया तैं दिल दूर । सांई सेती संग कर, सहज सुरति लै पूर ॥ 26 ॥

  • 114 -

श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 दादू एक सुरति सौं सब रहें, पंचों उनमनि लाग। यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥ 27 ॥ दादू सहजैं सुरति समाइ ले, पारब्रह्म के अंग। अरस परस मिल एक है, सन्मुख रहबा संग ॥ 28 ॥ सुरति सदा सन्मुख रहै, जहाँ तहाँ लै लीन। सहज रूप सुमिरण करै, निष्कामी दादू दीन ॥ 29 ॥ सुरति सदा साबति रहै, तिनके मोटे भाग। दादू पीवैं राम रस, रहें निरंजन लाग ॥ 30 ॥ सूक्ष्म सौंज दादू सेवा सुरति सौं, प्रेम प्रीति सौं लाइ। जहाँ अविनाशी देव है, तहँ सुरति बिना को जाइ ॥ 31 ॥ विनती दादू ज्यों वै बरत गगन तैं टूटै, कहाँ धरणी कहँ ठाम। लागी सुरति अंग तैं छूटै, सो कत जीवै राम ॥ 32 ॥ अध्यात्म सहज योग सुख में रहै, दादू निर्गुण जाण। गंगा उलटी फेरि कर, जमुना मांहि आण ॥ 33 ॥ लय परआतम सो आत्मा, ज्यों जल उदक समान। तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावै पद निर्वाण ॥ 34 ॥ मन ही सौं मन सेविये, ज्यों जल जलहि समाइ। आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 35 ॥ छाड़ै सुरति शरीर को, तेज पुंज में आइ। दादू ऐसे मिल रहै, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 36 ॥ यों मन तजै शरीर को, ज्यों जागत सो जाइ। दादू बिसरै देखतां, सहज सदा ल्यौ लाइ ॥ 37 ॥

  • 115 -

श्री दादूवाणी-लै का अंग 7 जिहि आसन पहली प्राण था, तिहि आसन ल्यौ लाइ । जे कुछ था सोई भया, कछू न व्यापै आइ ॥ 38 ॥ तन मन अपणा हाथ कर, ताहि सौं ल्यौ लाइ । दादू निर्गुण राम सौं, ज्यों जल जलहि समाइ ॥ 39 ॥ एक मना लागा रहै, अंत मिलेगा सोइ । दादू जाके मन बसै, ताको दर्शन होइ ॥ 40 ॥ दादू निबहै त्यौं चलै, धीरे धीरज मांहि । परसेगा पीव एक दिन, दादू थाके नांहि ॥ 41 ॥ लय जब मन मृतक ह्वै रहै, इन्द्री बल भागा । काया के सब गुण तजै, निरंजन लागा ॥ 42 ॥ आदि अंत मधि एक रस, टूटै नहीं धागा । दादू ऐकै रह गया, तब जाणी जागा ॥ 43 ॥ जब लग सेवग तन धरै, तब लग दूसर आहि । एकमेक ह्वै मिलि रहै, तो रस पीवन तैं जाइ ॥ 44 ॥ ये दोनों ऐसी कहैं, कीजे कौन उपाइ । ना मैं एक, न दूसरा, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 45 ॥ इति श्री दादूदास-विरचिते सतगुरु-प्रसादेन प्रोक्तं भक्तियोगनाम तत्वसारमत-सर्वसाधुर्बुद्धिज्ञान-सर्वशास्त्र-शोधितं रामनाम सतगुरुशिक्षा धर्मशास्त्र-सत्योपदेश-ब्रह्मविद्यायां मनुष्य जीवनाम् नित्य-श्रवणं पठनं मोक्षदायकम् श्री दादूवाणीनाम् माहात्म्य सातवां लै का अंग सम्पूर्ण ॥ अंग 7 ॥ साखी 45 ॥

  • 116 -