भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 504 में से

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श्री दादूवाणी-हैरान का अंग 6 सब ही ज्ञानी पंडिता, सुर नर रहे उरझाइ । दादू गति गोविन्द की, क्यों ही लखी न जाइ ॥ 5 ॥ जैसा है तैसा नाम तुम्हारा, ज्यों है त्यों कह सांई । तूं आपै जाणै आपको, तहँ मेरी गम नांहि ॥ 6 ॥ केते पारिख अंत न पावैं, अगम अगोचर मांही । दादू कीमत कोई न जानै, खीर नीर की नांही ॥ 7 ॥ जीव ब्रह्म सेवा करै, ब्रह्म बराबर होइ । दादू जाणै ब्रह्म को, ब्रह्म सरीखा सोइ ॥ 8 ॥ वारपार को ना लहै, कीमत लेखा नांहि । दादू एकै नूर है, तेज पुंज सब मांहि ॥ 9 ॥ पीव पिछान हस्त पांव नहिं शीश मुख, श्रवण नेत्र कहुं कैसा । दादू सब देखैं सुनैं, कहै गहै है ऐसा ॥ 10 ॥ ‘पाया पाया’ सब कहैं, केतक ‘देहुँ दिखाइ ।’ कीमत किनहूँ ना कही, दादू रहु ल्यौ लाइ ॥ 11 ॥ अपना भंजन भर लिया, उहाँ उता ही जाण । अपणी अपणी सब कहैं, दादू बिड़द बखाण ॥ 12 ॥ पार न देवै आपना, गोप गूझ मन मांहि । दादू कोई ना लहै, केते आवैं जांहि ॥ 13 ॥ गूं गे का गुड़ का कहूँ, मन जानत है खाइ । त्यों राम रसायन पीवतां, सो सुख कह्या न जाइ ॥ 14 ॥ दादू एक जीभ केता कहूँ, पूरण ब्रह्म अगाध । वेद कतेबां मित नहीं, थकित भये सब साध ॥ 15 ॥ दादू मेरा एक मुख, कीर्ति अनन्त अपार । गुण केते परिमित नहीं, रहे विचार विचार ॥ 16 ॥

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