सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)
Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary
सन्त दादू दयाल जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दादूवाणी-परिचय का अंग 4 दादू सूतां पीछे सुरति निरति सूं, बालक ज्यूं पय पीवे। ऐसेअन्तर लगन नाम सूं, आतम जुग-जुग जीवे ॥ 270 ख ॥ ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और। यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥ 271 ॥ जहाँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि। दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥ 272 ॥ दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार। तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥ 273 ॥ तेज पुंज “को बिलसना”, मिलि खेलैं इक ठांव। भर भर पीवै राम रस, सेवा इसका नांव ॥ 274 ॥ अरस परस मिल खेलिये, तब सुख आनंद होइ। तन मन मंगल चहुँ दिशि भये, दादू देखे सोइ ॥ 275 ॥ सुन्दरी सुहाग मस्तक मेरे पांव धर, मंदिर माहीं आव। सैंयां सोवै सेज पर, दादू चम्पै पांव ॥ 276 ॥ ये चारों पद पलंग के, साँई की सुख सेज। दादू इन पर बैस कर, साँई सेती हेज ॥ 277 ॥ प्रेम लहर की पालकी, आतम बैसे आइ। दादू खेलै पीव सौं, यहु सुख कह्या न जाइ ॥ 278 ॥ अर्चना भक्ति दादू देव निरंजन पूजिये, पाती पंच चढाइ। तन मन चंदन चर्चिये, सेवा सुरति लगाइ ॥ 279 ॥ भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने कोइ। दादू भक्ति भगवंत की, देह निरन्तर होइ ॥ 280 ॥ देही मांही देव है, सब गुण तैं न्यारा। सकल निरंतर भर रह्या, दादू का प्यारा ॥ 281 ॥
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