भारतकोश
दासबोध (समर्थ रामदास स्वामी - सम्पूर्ण २० दशक एवं २०० समास सटीक)

दासबोध (समर्थ रामदास स्वामी - सम्पूर्ण २० दशक एवं २०० समास सटीक)

Dasbodh of Samarth Ramdas Swami with Commentary

समर्थ रामदास स्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished467 पृष्ठ

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पृष्ठ 294

१० वा.] चलाचल. २४९ गगनीं भरे। सरोवर देखतांच पसरे। पदार्थ रक्षून उरे। चहूंकडे ॥ ३८ ॥ जैसा पदार्थ दृष्टीस दिसतो। तो त्या पदार्थासारिखाच होतो। वायूहून विशेष तो। चंचळविषयीं ॥ ३९ ॥ कित्येक दृष्टीनें देखे। कित्येक रसनेनें चाखे। कित्येक ते वोळखे। मनेंकरूनी ॥ ४० ॥ श्रोत्रीं बैसोन शब्द ऐ- कतो। घ्राणेंद्रियें वास घेतो। त्वचेंद्रियें जाणतो। शीतोष्णादिक ॥ ४१ ॥ ऐशा जाणे अंतरकळा। सकळांमध्यें परी निराळा। पाहतां त्याची अगाध लीला। तोचि जाणे ॥ ४२ ॥ तो पुरुष ना सुंदरी। बाळ तरुण ना कुमारी। नपुंसकाचा देहधारी। परी नपुंसक नव्हे ॥ ४३ ॥ तो चालवी सकळ दे- हांसी। करून अकर्ता म्हणती त्यासी। तो क्षेत्रज्ञ क्षेत्रवासी। देहीं कूटस्थ बोलिजे ॥ ४४ ॥ श्लोक ॥ द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ॥ क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १ ॥ टीका ॥ दोन्ही पुरुष लोकीं अ- सती। क्षराक्षर बोलिजेती। सर्व भूतें क्षर म्हणती। अक्षर कूटस्थ बोलिजे ॥ ४५ ॥ उत्तम पुरुष तो आणिक। निष्प्रपंच आणि निष्कलंक। निरंजन परमात्मा एक। निर्विकारी ॥ ४६ ॥ चारी देह निरसावे। साधकें देहा- तीत व्हावें। देहातीत होतां जाणावें। अनन्य भक्त ॥ ४७ ॥ देहमात्र नि- रसोन गेला। तेथें अंतरात्मा कैंचा उरला। निर्विकारीं विकारला। विका- रचि नाहीं ॥ ४८ ॥ निश्चळ परब्रह्म एक। चंचळ जाणावें मायिकें। ऐसा प्रत्यय निश्चयात्मक। विवेकें पाहावा ॥ ४९ ॥ येथें बहुत नलगे खळखळ। एक चंचळ एक निश्चळ। शाश्वत कोण हें केवळ। ज्ञानें ओळखावें ॥ ५० ॥ असार त्यागून घेइजे सार। म्हणोन सारासार विचार। नित्यानित्य निरं- तर। पाहती ज्ञानी ॥ ५१ ॥ जेथें ज्ञानाचें होतें विज्ञान। जेथें मनाचें होतें उन्मन। तेथें कैंचें चंचळपण। आत्मयासी ॥ ५२ ॥ सांगणी वांग- णीचें काम नव्हे। आपुल्या अनुभवें जाणावें। प्रत्ययेंविण सिणावें। तेंचि पाप ॥ ५३ ॥ सत्याएवढें सुकृतें नाहीं। असत्याएवढें पाप नाहीं। प्रची- तीविण कोठेंचि नाहीं। समाधान ॥ ५४ ॥ सत्य म्हणिजे स्वरूप जाण। असत्य माया हें प्रमाण। येथें निरूपिलें पाप पुण्य। रूपांसहित ॥ ५५ ॥ दृश्य पाप वोसरलें। पुण्य परब्रह्म उरलें। अनन्य होतांच झालें। नामा- १. कानामध्यें. २. नाकामध्यें. ३. त्वचेमध्यें. ४. खट. ५. पुण्य,

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