दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
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॥ श्रीः ॥ दशकुमारचरितम् पूर्वपीठिका प्रथमोच्छ्वासः ब्रह्माण्डच्छत्रदण्डः शतधृतिभवनाम्भोरुहो नालदण्डः ॐ अथ बालविबोधिनी ॐ नवनीरधरच्छायां जितपूर्णेन्दुविग्रहम् । नीलां वाऽप्यथवा शुभ्रां काञ्चिदेकां गिरं श्रये ॥ पितरावग्रजन्मानं गुरूंच्चाप्य यत्नतः । व्याख्यां दशकुमारस्य कुर्वे बालविबोधिनीम् ॥ आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखमित्यनुशासनमनुसरता तत्रभवता कविकुलधौरेयेणाचार्यदण्डिना चिकीर्षितस्य दशकुमारचरिताख्यस्य गद्यकाव्यस्य प्रत्यूहव्यूहविध्वंसनाय भगवच्चरणारविन्दस्मरणरूपं मङ्गलं कर्तुमुपक्रम्यते ब्रह्माण्डे- त्यादिना । ॐ बालक्रीड़ा ॐ नवनीत खा, नवनीत सब लाते* कहाँसे पात्रमें । औ मूकको वाचाल भी करते अहो क्षणमात्रमें ॥ जो विस्मयान्वित वस्तुओंकी शक्तिके कर्त्ता सदा । वे कृष्णजी सह राधिका जिह्वाग्रणी हों सर्वदा ॥ संसारमें कार्य-कारण दोनोंका नियतसिद्ध एक सम्बन्ध है । जिस स्थानमें कार्य रहता है वहीं कारण रहता है क्योंकि कार्य विना कारणके कभी नहीं होता । यदि यह कहा जाय कि, 'कारण रहनेपर कार्य स्वयमेव हो जाता है' तो यह बात अपूर्ण है एवं अनिश्चित भी है। प्रायः देखा जाता है कि कार्य कारणके रहनेपर भी नहीं होता । अत एव उपर्युक्त बात सर्वथा सत्य है क्योंकि जब कार्य विना कारणके नहीं होता है तब कार्यसाधक कोई दैवीशक्ति है जिसे कार्यप्रतिबन्धक भी कहा जा सकता है। उसी दैवीशक्तिके, जो कार्यकी प्रतिबन्धक है, दूर
- जो माखन खाकर गोपियोंकी प्रार्थनापर अपनी लीलासे उसी क्षण बरतन भर देते हैं ।
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