भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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२ दशकुमारचरितम्। [ पूर्वपीठिकायां क्षोणीनौकूपदण्डः क्षरदमरसरित्पट्टिकाकेतुदण्डः। ज्योतिश्चक्राक्षदण्डस्त्रिभुवनविजयस्तम्भदण्डोऽङ्घ्रिदण्डः अत्र कविना वामनरूपेणावतीर्णस्य भगवतो नारायणस्य बलिनियमनार्थमावि- ष्कृतस्य पादत्रयस्य वर्णनं कृतम्। तेष्वेकः पाद ऊर्ध्वमुत्क्षिप्तः समस्तं गगनं, द्वितीयश्चाधोगतः सम्पूर्णां क्षोणीं, तृतीयः पुनर्नाभितो निर्गतो बलेरुत्तमाङ्गं समा- क्रान्तवानिति पौराणिकी कथा। रूपकेण कविस्तामेव विशिनष्टि— ब्रह्माण्डं जगदेव छत्रमातपत्रं तस्य दण्ड आधारयष्टिः। भगवतः समस्तजगदाधा- रत्वात्। एतेनोर्ध्वपादो गम्यते। शतधृतेर्ब्रह्मणो भवनं गृहमाश्रय इत्यर्थः, यदम्भोरुहं कमलं तस्य नालदण्डो वृन्तभूता यष्टिः, अनेन मध्यमपादो गम्यते। क्षोणी क्षितिरेव नौस्तरणिस्तस्याः कूपदण्डो गुणवृक्षः, एतेन भूतस्थपादो गम्यते। क्षरन्ती प्रवह- माणा याऽमरसरिदाकाशगङ्गा सैव पट्टिका पताका तस्याः केतुदण्डो ध्वजदण्डस्व- रूपः, अयमप्यूर्ध्वपादः। ज्योतिषां ग्रहनक्षत्रादीनां चक्रं मण्डलमेव चक्रं रथ चक्रमित्यर्थः, तस्याक्षदण्डः काष्ठदण्डविशेषः। त्रयाणां भुवनानां समाहारः त्रिभुवनं त्रैलो- क्यं तस्य यो व्यापनरूपो विजयस्तत्सूचकः स्तम्भदण्डः। विबुधद्वेषिणामसुराणां हो जानेपर कार्यसिद्धि हो जाती है। वह कार्यप्रतिबन्धक शक्ति ईश्वरानुकम्पासे ही दूर हो सकती है इसी कारण भक्त जन स्वसम्प्रदायानुसार विशेष तथा सामान्य रीतिसे सज-धज एवं भावनाके साथ परमपिता परमेश्वरका या उनकी कृतियोंका आराधन करते हैं। उसी भावमय भक्तिका नाम मंगलाचरण है जो ग्रन्थारम्भमें की जाती है। आगामी सृष्टिके सभी लोग—प्राणिमात्र—इस मंगलाचरण से सुन्दर फल प्राप्त करें इसी कारण ग्रन्थकृत् सज्जन अपने-अपने ग्रन्थोंके प्रारम्भमें मंगलाचरण करते हैं, जिसके कारण अध्यापक तथा शिष्यों, पाठक एवं पाठिकाओंको अनायास ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है। पूज्यपाद दण्डी कविने भी इसी प्रणालीके आधारपर अपने ग्रन्थ—दशकुमारचरित—की रचनाके आरम्भमें भगवान् वामनके चरणकी वन्दना की, जिससे उनके ग्रन्थकी निर्विघ्न समाप्ति भी हो तथा सुहृदोंको लाभ भी हो। वे अपनी भावमयी भक्ति निम्नरीत्या प्रदर्शित करते हुए भगवान्‌के चरणकमलोंकी स्तुति करते हैं— परमपिता परमेश्वर वामन भगवान्‌का चरणकमलदण्ड आपका तथा पाठक-पाठिकाओंका कल्याण करनेवाला है। जिस समय देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिए विष्णु भगवान्‌ने छद्मवेषी वामनावतार धारण किया था तथा पातालके राजा बलिसे तीन चरण पृथ्वी-दानका संकल्प करा लिया था उस समय राजा बलिको छद्मसे वन्दी करनेके हेतु उन्होंने तीनों लोकोंको नापनेके लिए अपना चरणरूपमात्र दण्ड बनाया था तथा उसे आकाशतक लम्बायमान कर दिया था। उस समय वह चरण जैसा प्रतीत होता था उसीका वर्णन इस श्लोकमें चित्रित किया गया है।

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