भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

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१०४ दशकुमारचरितम् । [ पूर्वपीठिकायां नीराजितराजमन्दिराभोगा भोगिनो भयं जनयन्तो निश्चेरुः । (२५). गृध्राश्च बहवस्तुण्डैरहिपतीनादाय दिवि समचरन् । ततोऽग्र- जन्मा नरसिंहस्य हिरण्यकशिपोर्दैत्येश्वरस्य विदारणमभिनीय महाश्चर्या- न्वितं राजानमभाषत—'राजन्, अवसानसमये भवता शुभसूचकं द्रष्टुमुचि- तम् । ततः कल्याणपरम्परावाप्तये भवदात्मजाकारायास्तरुण्या निखिल- लक्षणोपेतस्य राजनन्दनस्य विवाहः कार्यः' इति । तदवलोकनकुतूहलेन महीपालेनानुज्ञातः स संकल्पितार्थसिद्धिसंभावनसम्फुल्लवदनः सकलमो- हजनकमञ्जनं लोचनयोर्निक्षिप्य परितो व्यलोकयत् । सर्वेषु 'तदैन्द्रजालि- कमेव कर्म' इति साद्भुतं पश्यत्सु रागपल्लवितहृदयेन राजवाहनेन पूर्व- शिरःस्थितरत्नश्रेणिभिः नीराजित उज्ज्वलीकृतो राजमन्दिरस्याभोगः प्रदेशो यैस्ते । भोगिनः सर्पाः । निश्चेरुः चरन्ति स्म । (१२) गृध्राः पक्षिद्विशेषाः । तुण्डैर्मुखैः । अहिपतीन् सर्पश्रेष्ठान् । दिवि गगने । अग्रजन्मा ब्राह्मणः । विदारणं नखैश्छेदनम् । अभिनेय दर्शयित्वा । अवसानसमये क्रीडासमाप्तौ । कल्याणानां परम्परा श्रेणिस्तस्या अवाप्तये प्राप्तये । भवत आत्मजा नन्दिनी तस्या आकार इवाकारो यस्यास्तस्याः भवतकन्यासदृश्या इत्यर्थः । निखिल- लक्षणोपेतस्य सर्वसुलक्षणयुक्तस्य । अनुज्ञात आदिष्टः । सकल्पितस्य अभीष्टस्य उसने बड़े-बड़े साँपोंको सहसा निकालना शुरू किया उन सांपोंके मुखोंसे विष निकल रहा था उनके मस्तकपर रखी मणियाँ राजमन्दिरके आँगनको देदीप्यमान बना रही थीं । उन सर्पोंको सभी दर्शक डर गये और कुछ-कुछ दूर हट गये । (२५) दर्शकोंको भयान्वित देखकर उस विद्येश्वरने बड़े-बड़े गृध्र उत्पन्न किये जो अपने बड़े बड़े चंगुलोंमें उन विषधर सर्पोंको पकड़कर आकाशमें उड़ने लगे । फिर उसने नृसिंह भगवान्को उत्पन्न कराया तथा उनके द्वारा हिरण्यकशिपुदैत्येश्वरके विदारणका अति आश्च- र्यकारी रूपक दर्शकोंको दिखाकर मुग्ध किया और राजासे कहा—इन्द्रजालके सभी खेलोंके पश्चात् एक मांगलिक रूपक देखना सर्वथा उचित है । इस शुभ परम्परासूचक खेलकी कल्याण परम्परामें मैं आपकी पुत्रीके समान स्वरूपवाली युवतीका विवाह सभी तरहके राजलक्षणोंसे युक्त एक राजकुमारसे कराऊंगा । उस रूपकको देखनेकी राजा मानसारको प्रबल उत्कंठा हुई । अपनी पूर्वसंकल्पित मनोभिलाषाको पूर्ण करनेवाली राजाज्ञा प्राप्त करके विद्येश्वर प्रसन्न चित्त हो गया और मुख चमक उठा । तत्काल ही उसने डिब्बीसे समस्त जनोंको मोहित करनेवाला अंजन निकाला और उसे अपनी दोनों आँखोंमें लगा लिया तथा चारों ओर देखने लगा । सब लोग यह समझने लगे कि यह भी कोई जादूका कार्य है तथा विस्मित होकर उसे देखने लगे । रागपल्लवित राजवाहन द्वारा पहलेसे संकेतित राजकुमारी बहुत तरहके आभूषणों