दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF दशकुमारचरितम् ! [ उत्तरपीठिकायां सा भृशं रुरोद । रुदितान्ते च सा सार्थघाते स्वहस्तगतस्य राजपुत्रस्य किरातभर्तृहस्तगमनम् , आत्मनश्च केनापि वनचरेण व्रणविरोपणम्, स्वस्थायश्च पुनस्तेनोपयन्तुं चिन्तितायानि कृष्टजातिसंसर्गवैकल्य्यात्प्रत्या- ख्यानपारुष्यम्, तदक्षमेण चामुना विविक्के विपिने स्वशिरःकर्तनोद्यमः, अनेन यूना यदृच्छया दृष्टेन तस्य दुरात्मनो हननम् , आत्मनश्चोपयमन- मित्यकथयत् । (५) स तु पृष्टो मैथिलेन्द्रस्यैव कोऽपि सेवकः कारणविलम्बी तन्मार्गानुसारी जातः। सह तेन भर्तुरन्तिकमुपसृत्य पुत्रवृत्तान्तेन श्रोत्र- निकृष्टजातीति-नीचजातीयकिरातसंसर्गदोषदुष्टतया तद्विवाहस्य प्रत्याख्यानेना- स्वीकारेण यत्पारुष्यं कार्कश्यम् तथा कृतमिति शेषः । तदक्षमेण तत्सोढुमशक्नु- वता। अमुना किरातेन । विविक्ते निर्जने । स्वशिरःकर्त्तनोद्यमः मद्दुहितुर्मस्तक- च्छेदनप्रयासः । यदृच्छया दैवगत्या सहसा वा । उपयमनं विवाहस्तेन यूना सहेत्यर्थः । (५) सः मद्दुहितुः परिणेता । मैथिलेन्द्रस्य विदेहाधिपप्रहारवर्मणः । सेवको भृत्यः । कारणविलम्बी प्रयोजनवशेन कृतविलम्बः तन्मार्गानुसारी तस्य राज्ञो मा- र्गानुसारी येन मार्गेण राजा जगाम तेनैव सोऽपि तमन्वसारेति भावः। भर्तुः प्रभोः। उसी समय मेरी पुत्री किसी युवकके साथ उस स्थान में आ पहुँची । वह आकर अत्यन्त रोने लगी । रोनेके पश्चात् उस पुत्री के साथ छूटनेपर राजाके दूसरे पुत्रका किरातके पतिके हाथमें जाना, किसी वनेचरद्वारा अपनी सेवा-शुश्रूषाका होना तथा शेरके नखक्षतोंका उपचार होना, स्वस्थ होने पर उसी वनेचरद्वारा विवाहका प्रस्ताव किया जाना, नीच जातिके संसर्गसे व्याकुल होना, विवाहके प्रस्तावका विरोध करनेसे उस वनेचरको स्वयं (पुत्रीद्वारा) कर्कश वचन कहा जाना, वनेचरद्वारा कर्कश वचनोंके प्रतिवादमें उसको निर्जन वनमें ले जा करके शिर काटने का उद्योग करना, दैवगतिसे इस युवकका (जो साथ में था) उस जंगलमें आना तथा उस वनेचरका वध करना, एवं अपना विवाह उस युवकके साथ होनेका समाचार सुनाना आदि (सभी बातें अपनी मातासे कह सुनायी) । (५) इसके पश्चात् पूछे जानेपर उस कन्याके पतिने कहा कि मैं भी मैथिलेन्द्रका ही एक सेवक हूं तथा किसी कारणवश विलम्ब करके उन्हीं मैथिलेन्द्र प्रहारवर्माके मार्गका अनुसरण करके जा रहा हूँ। उसी युवकके साथ दोनों स्वामी प्रहारवर्माके सन्निकट Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu