दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF तृतीयोच्छ्वासः ] बालविबोधिनीव्याख्यासहितम् । २२७ ( १५ ) अयं च निष्ठुरः पितृद्रोही नात्युपपन्नसंस्थानः कामोपचारे- ष्वलन्धवैचक्षण्यः कलासु काव्यनाटकादिषु मन्दाभिनिवेशः शौर्यो- न्मादी दुर्विकत्थनोऽनृतवादी चास्थानवर्षी । नातिरोचते मे एष भर्ता विशेषतश्चैषु वासरेषु यदयमुद्याने मदन्तरङ्गभूतां पुष्करिकामप्युपान्तवर्ति- नीमनादृत्य मयि बद्धसापत्न्यामत्सरा मनात्मज्ञाम आत्मनाटकीयां रमयन्तिकां ( १५) अयं विकटवर्मा । निष्ठुरः-निर्दयः । पितृद्रोही-पितुरनिष्टकारकः । पितृव्यस्य पितृतुल्यत्वात् अत्र पितृपदम् । नात्युपपन्नेति-नात्युपपन्नं अननुगुणं सं- स्थानमवयवसंनिवेशो यस्यासौ । दुर्लक्षणयुक्तशरीरावयवः कुरूप इति यावत् । कामोपचारेषु मदनव्यापारेषु । अलब्धवैचक्षण्यः अप्राप्तनैपुण्यः । कलासु चतुः- षष्टिप्रकारासु । मन्दाभिनिवेशः शिथिलाग्रहः । शौर्योन्मादो-बलदर्पोन्मत्तः । दुर्वि- कत्थनः-दुष्टः आत्मश्लाघानिरतश्च । अनृतवादी-मिथ्याभाषणशीलः । अस्था- नवर्षी-अयोग्यपात्रे दानशीलः । नातिरोचते प्रीतिकरो न भवति । मे-मह्यम् रुच्यर्थप्रयोगे चतुर्थी । विशेषतश्च-इतोऽप्यधिकम् । एषु वासरेषु-साम्प्रतम् । यत्- यस्मात् । अयं विकटवर्मा । मदन्तरङ्गभूताम् आत्मीयाम् । पुष्करिकां एतन्नामि- काम् । उपान्तवर्त्तिनीं समीपस्थिताम् । अनादृत्य-अवज्ञाय । बद्धेति-बद्धः घृतः सापत्न्यस्य शपत्नीत्वस्य मत्त्सरोऽसहनीयता यया ताम् । घृतसापत्न्यविद्वेषामित्यर्थः । अनात्मज्ञां-स्वयोग्यताज्ञानरहिताम् । आत्मनाटकीयां स्वकीयनर्त्तकीम् । रमय- न्तिकेति नर्त्तक्या नाम । अपत्यनिर्विशेषं स्वसन्तानवत् । मत्संवर्द्धितायाः-मया ( १५ ) यह विकटवर्मा अत्यन्त निष्ठुर है, आपके साथ द्रोह करनेवाला है, इसके शरीरकी बनावट भी अच्छी नहीं है। रति-लीलामें पटु नहीं है। चौंसठ प्रकारकी कलाओंमें तथा काव्य-नाटकादिमें भी शिथिल है। वीरतामें मदोन्मत्त है। आत्मप्रशंसा करनेवाला है। असत्यवादी है और अयोग्यों को दान देने वाला है। इस तरीकेका दुर्विनीत पति मुझे नहीं अच्छा लगता है। विशेष करके आजकलके दिनोंमें यह मेरा पति विकटवर्मा मेरी आत्मीया तथा सदा समीप रहनेवाली पुष्करिका का अनादर करता है। तथा जो मेरी समृद्धि नहीं पसन्द करती ऐसी एवं जो मुझ से सौतपना ( सापत्न्यभाव ) रखती है ऐसी और जो अपने स्वरूप के ज्ञान को भी नहीं जानती ऐसी रमयन्तिका नामक नर्त्तकीको चाहता है। जिस चम्पकलताको मैंने पुत्र के समान सींच करके बनाया है उसी चम्पकलताके फूलों को अपने हाथों से चुन करके उस रमयन्तिका नर्त्तकी का श्रृङ्गार करता है। मेरे द्वारा उपभोग करके त्यागी हुई क्रीड़ा-पर्वत में स्थित मणियों की शय्यापर उस नर्त्तकी रमयन्तिकाके साथ रमण करता है। यह मेरा पति मूर्ख Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu