भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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३० दशकुमारचरितम् । [ पूर्वपीठिकायां निश्चित्य सामदानाभ्यां तामनुनीयापहारवर्मेत्याख्याय देव्यै 'वर्धय' इति समर्पितवान् । (६६) कदाचिद्वामदेवशिष्यः सोमदेवशर्मा नाम कंचिदेकं बालकं राज्ञः पुरो निक्षिप्याभाषत - 'देव ! रामतीर्थे स्नात्वा प्रत्यागच्छता मया काननावनी वनितया कयापि धार्यमाणमेनमुज्ज्वलाकारं कुमारं विलोक्य सादरमभाणि- 'स्थविरे ! का त्वम् ? एतस्मिन्नटवीमध्ये बालकमुद्वहन्ती किमर्थमायासेन भ्रमसि' इति । (६७) वृद्धयाऽप्यभाषि-'मुनिवर ! कालयवनाम्नि द्वीपे कालगुप्तो नाम धनाढ्यो वैश्यवरः कश्चिदस्ति । तन्नन्दिनीं नयनानन्दकारिणीं सुवृत्तां नामैतस्माद्वीपादागतो मगधनाथमन्त्रिसंभवो रत्नोद्भवो नाम रमणीय- वादेन दानेन चोपायभूतेन । तां शबरीम् । अनुनीय सन्तोष्य । अपहारवर्मेत्याख्याय अपहारवर्मेति नाम कृत्वा । वर्धय पालय । (६६) राज्ञो राजहंसस्य । निक्षिप्य संस्थाप्य । काननावनी आरण्यप्रदेशे । स्थविरे वृद्धे सम्बोधनमेतत् । 'प्रवयाः स्थविरो वृद्धो जीनो जीर्ण' इत्यमरः । अटवी- मध्येऽरण्यमध्ये । उद्वहन्ती धारयन्ती । आयासेन क्लेशेन । (६७) कालयवननाम्नि कालयवनाख्ये । धनाढयो धनसमृद्धः । तन्नन्दिनीं तद्दुहितरम् । मगधनाथस्य मगधाधिपस्य मन्त्रिणोऽमात्यात् सम्भव उत्पत्तिर्यस्य सः । तत्पुत्र इत्यर्थः । रमणीयानामुत्कृष्टानां गुणानां सौन्दर्यादीनामालयो निलय दूसरा बालक यही है ऐसा निश्चय कर लिया। फिर समझा बुझाकर तथा कुछ द्रव्यादि देकर उस भीलिनीसे वह बालक ले लिया तथा उसका नाम अपहारवर्मा धर दिया और महिषीको सहेजकर कह दिया - 'हे देवि ! इसे पालो' । (६६) एक दिन वामदेव मुनिके शिष्य सोमदेवशर्माने एक बालक को राजाके समक्ष धर कर निवेदन किया- हे देव ! मैं रामतीर्थमें स्नानार्थ गया था। वहाँसे लौटते समय मुझे मार्गमें - वनदेशमें - एक वृद्धा इस सुन्दर बालकको लिए मिली। मैंने उनसे पूछा- 'हे वृद्धे ! तुम कौन हो ! क्यों इस निर्जन वनमें अकेली आयासके साथ बालक लिये घूमती हो ?' (६७) वृद्धाने उत्तर देते हुए कहा - 'हे मुनिवर ! कालयवन नामक एक महाद्वीप है । उसमें कालगुप्त नामक एक धनिक वैश्य रहता है। उसकी नयनाभिरामा सुवृत्ता नामकी पुत्रीसे इस द्वीपसे गये हुए मगधराजके मन्त्रिपुत्र रत्नोद्भवने परिणय किया। वह रत्नोद्भव अति सुन्दर अर्थात् रमणीयता का कोष था तथा सम्पूर्ण पृथ्वीतलपर पर्यटन कर चुका था

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