भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF षष्ठोच्छ्वासः ] बालविबोधिनीव्याख्यासहितम् । ३६१ जात्या चैवंभूतया समनुगता सती अकस्मादेव भर्तृद्वेष्यतां गतासि। यदि कश्चिदस्त्युपायः पतिद्रोहप्रतिक्रियायै दर्शयामुम्, मातर्हि ते पटीयसी' इति। ( ३८ ) अथासौ कथञ्चित्क्षणमधोमुखी ध्यात्वा दीर्घोष्णश्वासपूर्व- मवोचत्—'भगवति, पतिरेकदैवतं वनितानाम्, विशेषतः कुलजानाम्। अतस्तच्छुश्रूषणाभ्युपायहेतुभूतं किंचिदाचरणीयम्। अस्त्यस्मत्प्रातिवेश्यो वणिगभिजनेन विभवेन राजान्तरङ्गभावेन च सर्वपौरानतीत्य वर्तते। तस्य कन्या कनकवती नाम मत्समानरूपावयवा ममातिस्निग्धा सखी। पेण। शीलेन स्वभावेन। जात्या वंशेन। समनुगता युक्ता। भर्तृद्वेष्यतां पत्युरप्रि- यताम्। पतिद्रोहप्रतिक्रियायै भर्तृद्वेष्यता दूरीकरणाय। अमुम् उपायम्। मति- र्बुद्धिः। पटीयसी-अतिनिपुणा। (३८) असौ रत्नवती। दीर्घोष्णश्वासपूर्वं-दीर्घमुष्णञ्च निःश्वस्य। एकदैवतं एकमात्रदेवता। वनितानां स्त्रीणाम्। कुलजानां सत्कुलोत्पन्नानाम्। तच्छुश्रूषणेति- तस्य पत्युः शुश्रूषणस्य सेवनस्य यः अभ्युपायस्तस्य हेतुभूतं कारणभूतम् येन मे पतिशुश्रूषा भवेदिति भावः। आचरणीयं विधातव्यम् त्वयेति शेषः। अस्मत्प्रा- तिवेश्यः अस्माकं प्रतिवेशी। अभिजनेन वंशेन। विभवेन धनेन। राजान्तरङ्गभा- वेन-राजवल्लभतया। अतीत्य-अतिक्रम्य। तस्य प्रतिवेशिनः। मत्समानेति मया सामानं तुल्यं रूपं सौन्दर्यमवयवमङ्गञ्च यस्याः सा। अतिस्निग्धा अतिशयस्नेह- शालिनी। तया कनकवत्या। तद्धिमानहर्म्यतले तस्याः सौधकुट्टिमे। ततोऽपि कथनानुसार तप करो। निश्चय ही यह तुम्हारे प्राचीन पापोंके फल हैं कि इतनी सुन्दर आकृति, अच्छा स्वभाव, अच्छी जाति प्राप्त करके भी पतिकी सहसा अप्रिया हो गई हो। यदि पतिके द्रोहको दूर करनेका कोई यत्न होवे तो मुझसे कहो, क्योंकि तुम्हारी बुद्धि प्रखर है। (३८) तत्पश्चात् रत्नवती कुछ देरतक नीचे मुंह करके विचार करने लगी और फिर लम्बी और गरम सांस खींचकर बोली—'हे भगवति ! स्त्रियोंको केवल एक पतिही परमेश्वर हैं। प्रधानतः कुलवतियोंके अधिकरूपेण। अतः ऐसा कोई उपाय करना चाहिये जिससे मेरे पतिकी मुझसे सेवा हो सके। एक वैश्य मेरा पड़ोसी है जो वंशसे, धनसे और राजाका पार्श्ववर्ती होनेसे सभी नगरवासियोंसे बढ़ चढ़कर है। उस वैश्यकी एक पुत्री कनकवती नामकी है जो मेरे अनुरूप अंगवाली है तथा मेरी घनिष्ठ सहचरी भी है। उसके साथ गगनचुम्बी गृहकी छतपर उससे द्विगुणित सजकर विहार करूंगी। आप Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

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