दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोच्छ्वासः ] बालविबोधिनीव्याख्यासहितम् । ३६७ पाण्डुरा च मुखच्छविः, अनतिपरिभुक्तसुभगा च तनुः, प्रौढतानुविद्धा च दृष्टिः । न चैषा प्रोषितभर्तृका, प्रवासचिह्नस्य वेण्यादेरदर्शनात् । लघ्म चैतद्दक्षिणापार्श्ववर्ति । तदियं वृद्धस्य कस्यचिद्वणिजो नातिपुंस्त्वस्य यथार्हसंभोगालाभपीडिता गृहिणी त्वयातिकौशलाद्यथादृष्टमालिखिता भवितुमर्हति' इति । ( ४३ ) स तमभिप्रशस्याशंसत् — 'सत्यमिदम् । अवन्तिपुर्यामुज्जयि- न्यामनन्तकीर्तिनाम्नः सार्थवाहस्य भार्या यथार्थनामा नितम्बवती नामैषा विनीतता । पाण्डुरा शुभ्रा । मुखच्छविः मुखकान्तिः । अनतीति-नातिपरिभुक्ता स्वल्पपरिभुक्ता अतएव सुभगा मनोहारिणी । प्रौढतेति-प्रौढतया प्रागल्भ्येन अनु- विद्धा युक्ता-उत्तीर्णबालभावतया अचञ्चला । प्रोषितभर्तृका-प्रोषितः प्रवासङ्गतः भर्त्ता यस्याः सा । कार्यान्तरवशाद् यस्या दूरदेशं गतः पतिः । तदनागमदुःखार्त्ता सा स्यात्प्रोषितभर्तृकेति तल्लक्षणम् । अदर्शनादभावात् । यथा लघ्म चिह्नं नखक्ष- तरूपम् । तत्-तस्मादनुमीयते । नातिपुंस्त्वस्य शिथिलपुरुषत्वस्य । यथार्हेति-यथा- र्हस्य तदुचितस्य संभोगस्यालाभेन अप्राप्त्या पीडिता दुःखिता । गृहिणी भार्या । त्वया चित्रकारेण । अतिकौशलात्-नैपुण्यातिशयात् । यथादृष्टं-यथा दृष्टा तथैव । ( ४३ ) सः चित्रकारः । तं कुलपुत्रम् । अभिप्रशस्य प्रशंसां कृत्वा । अशंसत् अकथयत् । इदं त्वया यद् यत् कथितम् । यथार्थनाम-नितम्बस्य पृथुत्वान्नितम्ब- सूचित करनेवाली इसमें नम्रता है । इसके मुखकी कान्ति शुभ्र है । इसकी मनोहारिणी देह स्वल्पभोगित है । इसकी दृष्टि प्रौढत्त्वको वेध चुकी है अर्थात् अचञ्चल है । यह प्रोषितभर्तृका भी ( परदेश गये हुए पतिकी पत्नी ) नहीं है क्योंकि प्रवासमें गये हुए पतिकी स्त्रीके चिह्न, एक वेणी आदि, उसमें नहीं दिखायी देते हैं । इसके दाहिने हाथमें नखक्षत दीखता है जिससे ज्ञात होता है कि यह किसी वृद्ध वैश्यकी वनिता है । जो वृद्ध वैश्यके द्वारा कामेच्छा पूर्ण नहीं प्राप्त कर सकती है अर्थात् पौरुषहीन होनेसे वह ठीक-ठीक सम्भोग नहीं कर सकता, अत एव यह रमणी, सम्भोगक्रीड़ाकी यथोचित प्राप्तिसे वंचित दीखती है । मुझे तो ऐसा ज्ञात होता है कि तुमने ( चित्रकारने ) जैसी इसकी आकृति देखी है ठीक वैसी ही फोटो अपने नैपुण्यसे खींच ली है—चित्रमें चित्रित कर दी है ।' ( ४३ ) उस चित्रकारने, उस कलङ्ककंटककी प्रशंसाकर कहा—'यह बात सत्य है । अवन्तिका नगरी ( उज्जायिनी ) में बसनेवाले सार्थवाह अनन्तकीर्ति नामक व्यक्तिकी पत्नी यह नितम्बवती अनुरूप नामको धारण करनेवाली है । इसके सौन्दर्यगुणको देखकर