भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 474 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४१३ कल्पारम्भी, संभावयिता बुधान्, प्रभावयिता सेवकान्, उद्भावयिता बन्धून्, न्यग्भावयिता शत्रून्, असंबद्धप्रलापेष्वदत्तकर्णः, कदाचिदप्य- वितृष्णो गुणेषु, अतिनदीष्णः कलासु, नेदिष्ठो धर्मार्थसंहितासु, स्वल्पेऽपि सुकृते सुतरां प्रत्युपकर्ता, प्रत्यवेक्षिता कोशवाहनयोः, यत्नेन परीक्षिता सर्वाध्यक्षाणाम्, उत्साहयिता कृतकर्मणामनुरूपैर्दानमानैः, सद्यः प्रतिकर्ता दैवमानुषीणामापदाम्, षाड्गुण्योपयोगनिपुणः, मनुमार्गेण प्रणेता चातु- र्वर्ण्यस्य पुण्यश्लोकः पुण्यवर्मा नामासीत् । (४) स पुण्यैः कर्मभिः प्राप्य पुरुषायुषम्, पुनरपुण्येन प्रजानाम- दिना सत्कर्त्ता । प्रभावयिता प्रभुत्वकारकः । उद्भावयिता संवर्द्धकः । न्यग्भावयिता जेता । असंबद्धप्रलापेषु निरर्थकवचनेषु । अवितृष्णो विरागरहितः, सर्वदा गुणा- नुरक्त एवेत्यर्थः । अतिनदीष्णः परमपटुः । नेदिष्ठोऽतिसमीपवर्ती, सर्वदैव तत्र संलग्न- इति भावः । सुकृते केनापि कृते उपकारे । सुतरामतिशयेन । प्रत्यवेक्षिता । अनु- सन्धानकर्त्ता । परीक्षिता परीक्षकः । सर्वाध्यक्षाणां प्रधानकर्मकर्तॄणाम् । कृतं निष्पादितं कर्म कार्यं यैस्तेषाम् । प्रतिकर्त्ता शमयिता । षाड्गुण्यं सन्धिविग्रहादिः तेषामुपयोगे विविच्य प्रयोगे निपुणः कुशलः । मनुमार्गेण मनूक्तपद्धत्या । पुण्य- श्लोकः पवित्रकीर्त्तिः । (४) सः पुण्यवर्मा । पुण्यैः कर्मभिः, यज्ञदानादिभिः । पुरुषायुषं पूर्णमायुः, शतं वर्षाणीति यावत् । प्राप्य लब्ध्वा । प्राप्येति पाठे जीवित्वेत्यर्थः । अपुण्येन प्रभाववर्द्धक, बन्धुओंकी सहायता करनेवाला, शत्रुओंका दमन करनेवाला तथा कार्यकुशल था । वह कभी असम्बद्ध तथा व्यर्थ बातोंपर ध्यान ही नहीं देता था । गुणोंकी प्राप्तिमें सदा वह तत्पर रहता था । सभी कलाओंका वह परिज्ञाता था । धर्म और अर्थका संग्रह करनेमें वह सदा प्रयत्नशील रहता था । यदि कोई उसका थोड़ा भी उपकार कर देता था तो उसके लिये वह अत्यधिक प्रत्युपकार करता था। अपने कोश और वाहनोंपर सदा दृष्टि रखता था । अपने समस्त कर्मचारियोंकी गुप्त रूपसे परीक्षा किया करता था । कार्यदक्ष लोगोंके पदोंकी अभिवृद्धि करता हुआ उन्हें पुरस्कृत करता रहता तथा सदा अर्थकी सहायतासे उनको सन्तुष्ट रखता था । सन्धि, विग्रह, यान, आसन, आश्रय, द्वैधीभाव इन छहों गुणोंका वह विधिवत् पालन करता था । मनुस्मृतिके अनुसार चारों वर्णोंके तथा चारों आश्रमोंके धर्मोंका पालन प्रजासे करवाता था । उसकी पवित्र कीर्ति समस्त भूतलपर छायी हुई थी । (४) उसने मानवीय अवस्थाका सुख पूर्णरूपेण भोगा और अन्तमें वह प्रजाके Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu